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इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, पति की आय का 25% गुजारा भत्ता देना तय नियम नहीं, परिस्थितियों पर निर्भर

July 15, 2026

नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने गुजारा भत्ते (Maintenance Allowances) को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा पति (Divorced husband) की सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी (Wife) को देना कोई अनिवार्य कानूनी नियम नहीं है। अदालत ने कहा कि यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है और प्रत्येक मामले के तथ्यों व परिस्थितियों के आधार पर अदालत कम या अधिक राशि तय कर सकती है।

जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कानपुर देहात के एक दंपति से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए पत्नी को मिलने वाले मासिक गुजारा भत्ते को 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये कर दिया।

मामला पिंकी उर्फ प्रीति और उनके पति श्री जय प्रकाश से संबंधित है। पति ने पहले तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए गुजारा भत्ते को चुनौती दी, जबकि पत्नी ने भत्ता अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि केवल तलाक हो जाने से पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता। यदि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने पुनर्विवाह नहीं किया है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ नहीं रह रही है, तो वह गुजारा भत्ते की हकदार बनी रहती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य केवल न्यूनतम जीवन-निर्वाह सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि महिला को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है।


  • अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि रिवीजन कोर्ट सामान्य परिस्थितियों में निचली अदालत द्वारा तय की गई भत्ता राशि में बदलाव नहीं करती, क्योंकि उसका दायरा फैसले की वैधता की समीक्षा तक सीमित होता है। हालांकि, यदि निचली अदालत ने तथ्यों या उपलब्ध साक्ष्यों की अनदेखी करते हुए आदेश पारित किया हो, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

    सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पति का मासिक वेतन 86,674 रुपये है और सभी कटौतियों के बाद उसके खाते में 67,043 रुपये जमा होते हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना जल्दबाजी में भत्ते की राशि तय कर दी थी। साथ ही, पति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अपनी संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया था।

    इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को सुनाए गए फैसले में पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मासिक गुजारा भत्ता 20 हजार रुपये निर्धारित किया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संशोधित भत्ते की राशि आवेदन की तारीख से प्रभावी मानी जाएगी।

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