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महाभियोग से बचने जस्टिस वर्मा से पहले भी दो जज दे चुके हैं इस्‍तीफा, मिलता है ये लाभ

April 11, 2026

नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Verma) ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 9 अप्रैल को उन्होंने अपना इस्तीफा (Resign) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा, जिसके साथ ही संसद में प्रस्तावित महाभियोग की कार्यवाही स्वतः ही समाप्त हो गई। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी कार्यरत जज ने महाभियोग पूरा होने से पहले पद छोड़ दिया।

भारत में किसी जज को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है। अब तक किसी भी जज को इस प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है। जस्टिस वर्मा से पहले भी दो मामलों में महाभियोग की प्रक्रिया अंतिम चरण तक पहुंची, लेकिन जजों ने इस्तीफा देकर कार्रवाई रुकवा दी।


  • ये हैं पहले के मामले
    पहला मामला 2011 का है, जब कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन पर फंड हेराफेरी के आरोप लगे। जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया था, लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

    इसी तरह 2011 में सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पी.डी. दिनाकरन पर भी कदाचार के आरोप लगे थे। उनके खिलाफ जांच समिति गठित की गई, लेकिन प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले ही उन्होंने अविश्वास जताते हुए पद छोड़ दिया।

    मिलता है ये फायदा
    महाभियोग से पहले इस्तीफा देने का एक अहम पहलू यह भी है कि इससे जज को मिलने वाले रिटायरमेंट लाभ प्रभावित नहीं होते। मौजूदा कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो इस्तीफा देने पर पेंशन या अन्य सुविधाएं रोक सके। यही वजह है कि ऐसे मामलों में जजों को सेवानिवृत्ति के सभी लाभ मिलते रहते हैं।

    जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला मार्च 2025 से चर्चा में आया, जब वे दिल्ली हाईकोर्ट में पदस्थ थे। उनके सरकारी आवास में आग लगने की घटना के दौरान एक स्टोररूम से बड़ी मात्रा में जला और अधजला नकद, करीब 15 करोड़ रुपये, बरामद हुआ था। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इस रकम से अपना कोई संबंध होने से इनकार किया और कहा कि घटना के समय वे शहर से बाहर थे।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने जांच शुरू की। जांच के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और उनके न्यायिक कार्य भी वापस ले लिए गए।

    जुलाई 2025 में लोकसभा के 100 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद स्पीकर ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने ही वाली थी कि जस्टिस वर्मा ने 13 पन्नों का पत्र लिखकर जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए और खुद को इससे अलग कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच पूर्वाग्रह से ग्रसित है और उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं दिया जा रहा।

    अब आगे क्या होगा?
    संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, महाभियोग पूरा होने से पहले इस्तीफा देने पर पूरी संसदीय प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाती है। इसका सीधा असर यह होता है कि संबंधित जज को सेवानिवृत्ति के सभी लाभ मिलते रहते हैं। जस्टिस वर्मा के मामले में भी अब जांच और महाभियोग की कार्रवाई यहीं खत्म मानी जाएगी।

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