चेन्नई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय (C. Joseph Vijay) के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र टिप्पणी करने वाली डीएमके (DMK) पार्षद डी. सुधा को मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) से अग्रिम जमानत मिल गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने राजनीतिक आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में ऊंचे पदों पर बैठे नेताओं को आलोचना, उपहास और यहां तक कि अपशब्दों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। पुलिस राजनीतिक भाषणों का जवाब देने के लिए गिरफ्तारी की धमकी का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति एन. रमेश ने 16 पन्नों के आदेश में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा की असली परीक्षा तब होती है, जब भाषण भद्दा या अप्रिय हो, न कि तब जब भाषा विनम्र हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी नेता की आलोचना करने वाले व्यक्ति के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करते समय कानून और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन जरूरी है।
यह मामला 7 अक्टूबर का है, जब ग्रेटर चेन्नई नगर निगम के वार्ड 95 की पार्षद और डीएमके महिला विंग की पदाधिकारी डी. सुधा ने पार्टी की एक बैठक में मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। उनके भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया।
वीडियो में सुधा विजय पर डीएमके प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के व्यक्तित्व तथा रूप-रंग पर टिप्पणी करने का आरोप लगाती सुनाई देती हैं। उन्होंने स्टालिन की उम्र 74 वर्ष और विजय की उम्र 52 वर्ष बताते हुए दोनों की तुलना की। इसी दौरान उन्होंने स्टालिन को शेर और विजय को कथित तौर पर ‘लाश’ कहकर संबोधित किया।
इस बयान के करीब 12 दिन बाद तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के एक पदाधिकारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
राजनीतिक भाषण को अपराध बनाने पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित भाषण किसी समुदाय या वर्ग के खिलाफ नहीं था, बल्कि एक विरोधी राजनीतिक दल के नेता पर केंद्रित था। अदालत के अनुसार, उपलब्ध सामग्री से यह भी सामने नहीं आया कि भाषण में किसी को हिंसा करने या कोई गैरकानूनी कदम उठाने के लिए उकसाया गया हो।
कोर्ट ने मामले को मूल रूप से मानहानि की प्रकृति का बताते हुए कहा कि इसके लिए कानून में अलग प्रक्रिया मौजूद है। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि राजनीतिक बयान के मामले को एक अन्य व्यक्ति की शिकायत के आधार पर आपराधिक कार्रवाई में कैसे बदला गया।
न्यायमूर्ति रमेश ने पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा, “पुलिस राज्य की सेवा करती है, जो स्थायी है, न कि सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी की, जो बदलती रहती है।”
नेताओं को आलोचना और उपहास सहने के लिए तैयार रहना चाहिए
हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को आलोचना और उपहास सहने की क्षमता रखनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि पार्षद की भाषा को उचित ठहराया जा रहा है।
कोर्ट के अनुसार, किसी बयान का आपत्तिजनक या अशिष्ट होना और उसका आपराधिक कृत्य होना दो अलग-अलग बातें हैं। पुलिस को राजनीतिक संवेदनशीलता के मामलों में कार्रवाई करते समय इन दोनों के बीच अंतर समझना चाहिए।
डीएमके पार्षद ने जताया खेद, 25 हजार के मुचलके पर राहत
सुनवाई के दौरान डी. सुधा ने अपने शब्दों पर खेद जताया और मुख्यमंत्री विजय से माफी मांगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने उन्हें 25 हजार रुपये के निजी मुचलके पर अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
अदालत के इस फैसले ने राजनीतिक भाषणों, मानहानि और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की कानूनी सीमाओं पर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। फैसले का मुख्य संदेश यह है कि राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कठोर या अप्रिय टिप्पणी होने मात्र से गिरफ्तारी उचित नहीं हो जाती; कार्रवाई के लिए कानून के तहत पर्याप्त आधार होना आवश्यक है।
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