म्यूनिख/लंदन। क्या भविष्य में बिजली इतनी सस्ती और असीमित हो सकती है कि ऊर्जा संकट इतिहास (Energy crisis history) बन जाए? इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए जर्मनी (Germany) की एक कंपनी नई तकनीक पर काम कर रही है, जिसे उसके सीईओ फ्रांसेस्को सियोर्टिनो ने ‘डम्ब मशीन’ बताया है-यानी ऐसी मशीन जो एक बार बन जाए तो माइक्रोवेव जितनी आसान हो।
दरअसल, यह तकनीक न्यूक्लियर फ्यूजन पर आधारित है-वही प्रक्रिया जो सूरज के भीतर ऊर्जा पैदा करती है। इसमें हाइड्रोजन के कण आपस में मिलकर भारी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं। लेकिन धरती पर इसे दोहराना बेहद कठिन है, क्योंकि इसके लिए अत्यधिक तापमान पर ईंधन को प्लाज्मा अवस्था में बदलना पड़ता है, जिसे नियंत्रित करना बड़ी चुनौती है।
सबसे बड़ी चुनौती: मैग्नेट और लागत
स्टेलरेटर तकनीक की सबसे बड़ी बाधा इसके जटिल मैग्नेट हैं, जिन्हें बेहद सटीक आकार में बनाना पड़ता है। शुरुआती निर्माण महंगा और कठिन है, लेकिन कंपनी का मानना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने के बाद लागत कम हो सकती है। Proxima Fusion 2028-29 तक इन मैग्नेट्स के बड़े स्तर पर निर्माण की योजना बना रही है।
यूरोप की बढ़त और भविष्य
इस प्रोजेक्ट में Max Planck Institute जैसे संस्थानों का दशकों का अनुभव शामिल है, जिससे यूरोप को इस रेस में बढ़त मिल सकती है। वहीं STEP Project से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि असली सवाल तकनीक नहीं, बल्कि यह है कि कौन-सी प्रणाली व्यावहारिक रूप से बिजली पैदा कर पाएगी।
अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो यह ऊर्जा क्षेत्र में क्रांति ला सकता है—जहां साफ, सस्ती और लगभग असीमित बिजली उपलब्ध हो सकेगी।
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