
नई दिल्ली। बिहार के सहरसा जिले के बनगांव गांव(celebrated annually in Bangaon village in Bihar’s Saharsa district) में हर साल मनाई जाने वाली घमौर होली की परंपरा(The tradition of Ghamour Holi,) 1810 से चली आ रही है। संत लक्ष्मीनाथ गोसाई द्वारा(Saint Laxminath Gosai,) शुरू की गई यह होली आज भी अपने अद्वितीय अंदाज के लिए पूरे देश में मशहूर है। बनगांव IAS-IPS गांव (IAS-IPS village)के नाम(Bangaon is also known) से भी जाना जाता है, क्योंकि इस गांव से न जाने कितने बड़े अधिकारी निकले हैं। खास बात यह है कि इस होली में कंधों पर चढ़कर रंग खेला जाता है, जो केवल उत्सव नहीं बल्कि भाईचारे और एकता(brotherhood and unity.) का प्रतीक भी है।
200 साल पुरानी परंपरा का अनोखा अंदाज
बनगांव की घमौर होली 200 साल पुरानी है और इसमें हर समाज, हर जाति के लोग हिस्सा लेते हैं। होली के दिन लोग अपने-अपने मोहल्लों से भगवती स्थान पर एकत्र होते हैं। यहां छतों से पानी और अबीर उड़ाए जाते हैं और लोग झूमते हुए होली खेलते हैं। बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं—सब इस पर्व का आनंद लेते हैं। इस अनोखे पर्व में गांव का हर व्यक्ति, चाहे वह सामान्य हो या बड़ा अधिकारी, सब बराबर नजर आते हैं।
IAS-IPS अधिकारी भी झूमते हैं होली में
गांव की रहने वाली श्वेता कुमारी बताती हैं कि वे जहां भी रहें, होली के दिन अपने गांव आकर इस परंपरा में शामिल होती हैं। इस होली में सरकारी अधिकारी भी कंधों पर चढ़कर आम लोगों के साथ रंग खेलते हैं, और भाईचारे का संदेश फैलाते हैं। यही कारण है कि बनगांव की होली न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में अपनी अद्भुत परंपरा के लिए जानी जाती है।
बनगांव होली का संदेश
घमौर होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे का प्रतीक है। इस पर्व में जाति, धर्म और पद का कोई भेदभाव नहीं होता। सभी लोग मिलकर रंग, संगीत और खुशियों में डूबते हैं। बनगांव की यह होली यह साबित करती है कि सच्ची परंपरा और सामूहिक प्रेम समय के साथ और भी मजबूत होता है।
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