
नई दिल्ली। बिहार (Bihar) में गंगा नदी (Ganges River) के बढ़ते जलस्तर और बाढ़ के खतरों के बीच फरक्का बराज (Farakka Barrage) एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। हाल ही में बिहार सरकार (Bihar Government) के अनुरोध पर बंगाल प्रशासन (Bengal Administration) ने 24 घंटे के भीतर फरक्का बराज के गेट खोल दिए, जिससे राज्य के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को राहत मिलने की उम्मीद जगी है।
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल वितरण को लेकर लंबे समय से खींचतान चलती रही है। इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए 12 दिसंबर 1996 को दोनों देशों ने ऐतिहासिक गंगा जल बंटवारा संधि (फरक्का समझौता) पर हस्ताक्षर किए थे। इस द्विपक्षीय समझौते की कुल समय-सीमा 30 वर्ष निर्धारित की गई थी, जो दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। अब जैसे-जैसे इस संधि के पुनरीक्षण (Renewal) का समय नजदीक आ रहा है, इसके प्रावधानों और भविष्य की शर्तों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर असहमति और विवाद के सुर तेज होने लगे हैं।
गंगा नदी पर बने इस बांध का नाम फरक्का बैराज है. फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बना एक बड़ा बांध है. यह मुर्शिदाबाद जिले में है और बांग्लादेश की सीमा से सिर्फ 16-18 किलोमीटर ऊपर स्थित है. यह बांध लगभग 2.25 किलोमीटर लंबा है और इसमें 109 गेट लगे हैं.
दरअसल हुगली नदी में बहुत ज्यादा गाद (मिट्टी) जमा हो रही थी. इससे नदी उथली हो गई थी और बड़े जहाज बंदरगाह तक नहीं पहुंच पा रहे थे. विशेषज्ञों ने सोचा कि अगर गंगा का थोड़ा पानी हुगली नदी में डाल दिया जाए, तो गाद बह जाएगी और बंदरगाह चालू रहेगा।
1853 में ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने भी ऐसा ही सुझाव दिया था कि गंगा पर फरक्का के पास बैराज बनाकर पानी हुगली नदी में मोड़ना चाहिए. लेकिन तब इस पर अमल नहीं हो पाया था. फरक्का बैराज को समझने से पहले बंगाल में गंगा की धारा को समझना जरूरी है।
बिहार-झारखंड से बहती हुई गंगा पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में प्रवेश करती है. यहां तक इसे गंगा ही कहा जाता है. इसके बाद गंगा फरक्का पहुंचती है. फरक्का बैराज गंगा के पानी को नियंत्रित करता है। फरक्का बैराज के आसपास गंगा दो भागों में बंटती है.
दाहिनी शाखा भारत में रहती है और बाईं बांग्लादेश में जाती है। गंगा की जो धारा भारत यानी की पश्चिम बंगाल में बहती है वो भागीरथी कहलाती है. आगे चलकर इसे हुगली नदी के नाम से जाना जाता है. इसी धारा के किनारे कोलकाता और हल्दिया जैसे महत्वपूर्ण इलाके हैं. यही वह धारा है जिसके लिए फरक्का बैराज बनाया गया था।
फरक्का बैराज से 38 से 42 किलोमीटर लंबी एक फीडर कैनाल के जरिए गंगा का पानी हुगली में डाला जाता है, ताकि कोलकाता बंदरगाह में गाद न जमा हो. जबकि बाईं ओर की धारा बांग्लादेश में प्रवेश करती है. बांग्लादेश में इसे पद्मा कहते हैं. कहने का अर्थ यह है कि मुर्शिदाबाद जिले में गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़ने के उद्देश्य से फरक्का बैराज बनाया गया था. ताकि कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को हटाने और उसकी नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिले।
समस्या कहां आई
जब पानी हुगली की तरफ मोड़ा गया तो बांग्लादेश में गंगा का पानी कम हो गया. सूखे के मौसम में बांग्लादेश में पानी की किल्लत हो गई. इससे बांग्लादेश में खेती, मछली पालन और पीने के पानी पर असर पड़ा. इसी वजह से भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय तक विवाद चला.
बांग्लादेश ने आरोप लगाया कि सूखे मौसम में पानी कम होने से उनके कृषि, मछली पालन और पर्यावरण को नुकसान हुआ. इसी विवाद के कारण बाद में 1977, 1980 के दशक के अस्थायी समझौते हुए. भारत-बांग्लादेश के बीच इस मामले में ब्रेकथ्रू तब आया जब इस विवाद को सुलझाने के लिए वर्ष 1996 में फरक्का जल समझौता हुआ. इसे ‘गंगा वाटर्स शेयरिंग ट्रीटी’ भी कहते हैं।
फरक्का जल समझौता में क्या है
फरक्का जल समझौता भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे का समझौता है. इस समझौते पर 12 दिसंबर 1996 को नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे. इसकी अवधि 30 वर्ष है. यानी कि दिसंबर 2026 में यह समझौता समाप्त हो रहा है.
मॉनसून में तो पानी की उपलब्धता को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन यह समझौता मुख्य रूप से सूखे मौसम (1 जनवरी से 31 मई) के दौरान फरक्का बैराज पर उपलब्ध पानी का बंटवारा तय करता है.
पानी के बंटवारे का फॉर्मूला इस तरह है.
अगर फरक्का बैराज पर 70 हजार क्यूसेक या उससे कम पानी उपलब्ध है तो दोनों देशों को आधा आधा पानी मिलेगा. अगर उपलब्धता की मात्रा 70,000–75,000 क्यूसेक है तो बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक पानी और बाकी भारत को मिलेगा. 75,000 क्यूसेक या ज्यादा पानी होने पर भारत को 40,000 और बाकी पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा. मार्च-मई में दोनों देशों को बारी-बारी से 35,000 क्यूसेक पानी की गारंटी दी गई है. एक संयुक्त समिति पानी की निगरानी करती है।
बांग्लादेश की आपत्ति क्या है
लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश के बीच ये समझौता संतोषजनक ढंग से काम करता रहा. लेकिन हाल में ही बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश के सुर बदल गए. अब बांग्लादेश को ज्यादा पानी चाहिए. बांग्लादेश अब टकराव की मुद्रा में है और इस मु्द्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहता है. बांग्लादेश का कहना है कि जब समझौता किया गया था तो बांग्लादेश की आबादी कम थी, मौसम का संतुलन अलग था और इकोलॉजी भी आज के मुकाबले ज्यादा पॉजिटिव थी. लेकिन आज की स्थिति से काफी अलग हैं. जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और सूखे के कारण नदी के प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ी है।
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