वाशिंगटन। होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) में जारी तनाव के बीच ब्रिटेन (British Navy) और उसके सहयोगी देश संभावित सैन्य और समुद्री सुरक्षा (Maritime Safety) अभियान की तैयारी में जुट गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया टकराव थमने के बावजूद इस अहम समुद्री मार्ग पर स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है। इसी बीच ब्रिटिश नौसेना का युद्धपोत RFA लाइम बे जिब्राल्टर के तट पर तैनात किया गया है, जो कथित तौर पर माइंस हटाने के संभावित मिशन का इंतजार कर रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह युद्धपोत समुद्री सुरंगों (माइंस) को निष्क्रिय करने वाले ड्रोन, सोनार सिस्टम और आधुनिक हथियारों से लैस है। माना जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर इसे स्वेज नहर के रास्ते फारस की खाड़ी की ओर रवाना किया जा सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर वैश्विक समुद्री व्यापार पर भी देखने को मिल रहा है। बताया जा रहा है कि कई तेल टैंकर और कारोबारी जहाज फिलहाल होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने से बच रहे हैं। यह जलमार्ग दुनिया के तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरक आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार, क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने के बाद करीब 6,000 जहाज इस मार्ग से प्रभावित हुए हैं। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और व्यापारिक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है।
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सहयोगी देशों पर पर्याप्त समर्थन नहीं देने का आरोप लगाने के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने संयुक्त रूप से संभावित अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा अभियान की तैयारी शुरू कर दी है।
बताया जा रहा है कि RFA लाइम बे आगे बढ़ने से पहले ब्रिटिश डिस्ट्रॉयर HMS Dragon और अन्य सहयोगी जहाजों से जुड़ेगा, ताकि अभियान को एयर और समुद्री सुरक्षा समर्थन मिल सके।
सूत्रों के अनुसार, ब्रिटेन और फ्रांस फिलहाल किसी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत से पहले क्षेत्रीय हालात पर नजर बनाए हुए हैं। दोनों देश कथित तौर पर किसी औपचारिक शांति समझौते या तनाव कम होने के संकेत मिलने के बाद ही ऑपरेशन शुरू करना चाहते हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका इजरायल और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। उनके अनुसार, ईरान के साथ भी कई मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ चुकी है, हालांकि अभी अंतिम सहमति बाकी है।
होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव को लेकर दुनिया की निगाहें अब अमेरिका, ईरान और पश्चिमी देशों की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग माना जाता है।
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