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कोरोना संकटः पाक में कौन खड़ा है भारत के साथ

आर.के. सिन्हा
कोरोना की दूसरी लहर के कारण भारत में जो कुछ हो रहा है उसे सारी दुनिया ने देखा। सारी दुनिया आज इस संकट में भारत के साथ खड़ी है। भारत को दुनिया के विभिन्न देशों से मदद भी मिल रही है। पहले दौर में भारत ने सबकी बढ़-चढ़कर मदद की I लिहाजा सभी देश कोरोना के दूसरे दौर के संकट से भारत को उबारने में जुटे हुये हैं I पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सारी नैतिकता को ताक पर रख, कह रहे हैं कि अल्लाह की मेहरबानी से हमारे मुल्क में हालात काबू में है, जबकि हिन्दुस्तान में स्थिति बहुत खराब है।
हरेक भारतीय की यही चाहत है कि पाकिस्तान में भी हालात काबू में रहे। वहां भी कोरोना से किसी को नुकसान न हो। पर इमरान खान का बयान यह दिखाता है कि वे भारत को लेकर कितनी कटुता पाले हुये हैं। इस वैश्विक महामारी में भी वे बाज नहीं आ रहे। वे भारत का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सदैव अशुभ ही चाहते हैं। उन्हें यह समझ आ जाना चाहिए कि अल्लाह तो सबका है। वह किसी देश विशेष का नहीं है। भारत की 135 करोड़ आबादी भी अल्लाह पर यकीन करती है। हां, जिसे इमरान खान अल्लाह कह रहे हैं, उसे भारत में भी ईश्वर, भगवान, गॉड, वाहे गुरु या अल्लाह ही कहते हैं। हमारे लिये ईश्वर एक है। अगर बात मुसलमानों की करें तो भी भारत में पाकिस्तान की कुल आबादी से अधिक मुसलमान बसते हैं। इन सबकी अल्लाह के प्रति निष्ठा और अकीदा है।
काश, इमरान खान को भारत के बहुलतावादी समाज की जानकारी होती। हालांकि, उन्हें याद ही होगा साल 2004 का रमजान का महीना। वे दिल्ली में भारत-पाकिस्तान रिश्तों को लेकर चल रहे एक सम्मेलन में भाग लेने आए थे। वे तब तक तहरीके इंसाफ पार्टी के नेता थे। हालांकि उनकी पहचान एक अच्छे क्रिकेटर के रूप में अधिक होती थी। उन्होंने ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि वे आगे चलकर अपने देश के वजीरे आजम भी बन जाएंगे। सम्मेलन के दूसरे दिन उनकी चाहत थी जामा मस्जिद जाकर मगरिब की नमाज पढ़ने के बाद रोजा खोलें। उन्हें जामा मस्जिद लेकर जाने वाले कुछ लोग तैयार हो गए। जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी को भी सूचित कर दिया गया कि इमरान खान नमाज पढ़ने के लिए आ रहे हैं। उनकी कार सम्मेलन स्थल मौर्या शेरटन होटल से जनपथ होते हुए कनॉट प्लेस पहुंची। इमरान खान कार की खिड़की से बाहर दिल्ली के नजारे देख रहे थे। तब कोरोना के कहर से दिल्ली या दुनिया सहमी हुई नहीं थी। सबकुछ मौज में चल रहा था। कार जनपथ मस्जिद को पार करके जब कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल से गुजर रही थी तो वहां लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज परिसर के ठीक आगे अब्दुस सलाम मस्जिद और उसके चंदेक मिनटों के बाद आ गई मोती मस्जिद। सब में नमाजी आ-जा रहे थे। सारा माहौल उत्साह और उर्जा से लबरेज था। उसमें आध्यात्मिकता भरी हुई थी। इमरान खान कनॉट प्लेस की रौनक को महसूस कर रहे थे। उन्हें जामा मस्जिद पहुंचने से पहले आसफ अली रोड और दरियागंज में भी विभिन्न मस्जिदों के दर्शन हो रहे थे।
जामा मस्जिद पहुंचकर इमरान खान ने मगरिब की नमाज पढ़ी। उन्होंने रोजा खोला तो जामा मस्जिद में मौजूद तमाम रोजेदार उन्हें खजूर और फल देने पहुंच गए। उन्होंने खजूरों के साथ इंसाफ करते हुए शाहजहांबाद की हलचल पर गहरी नजर डाली। सब तरफ रमजान के महीने की रौनक दिखाई दे रही थी। ईद आने में भी अब गिनती के ही दिन बचे थे। वे जामा मस्जिद से लालकिले को देख पा रहे थे। जामा मस्जिद का सफर पूरा होने के बाद वापस जाते हुए लालकिला के आगे से गुजरे तो उन्हें बताया गया इसके लिए 29 अप्रैल, 1639 की तिथि सच में खास है। उस दिन मुगल बादशाह शाहजहां ने लालकिले की बुनियाद रखने के आदेश कुछ हिन्दू ज्योतिषियों और मुस्लिम धर्मगुरुओं की सलाह के बाद दिए थे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास के विद्यार्थी रहे इमरान खान यह सब बड़े ध्यान से सुन रहे थे। काश, इमरान खान को भारत के बहुलतावादी समाज और संस्कृति की जानकारी होती तो वे अल्लाह को सिर्फ अपना ही नहीं बताते। इमरान खान तो मुसलमानों में भी अंतर करते हैं। वे कश्मीर के मुसलमानों के हक में बोलते हैं I पर उनकी जुबान बांग्लादेश में रह रहे बिहारी मुसलमानों के मसले पर पूरी तरह से सिल जाती है।
उन्हें पता ही होगा कि सिर्फ ढाका में ही आज भी एक लाख से अधिक बिहारी मुसलमान नारकीय जिंदगी गुजार रहे हैं। बिहारी मुसलमान देश के बंटवारे के वक्त मुसलमानों के लिए बने देश पाकिस्तान में चले गए थे। जबतक बांग्लादेश नहीं बना था तब तक तो इन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। पर बांग्लादेश बनते ही बंगाली मुसलमान बिहारी मुसलमानों को अपना शत्रु मानने लगे। वजह यह थी कि ये बिहारी मुसलमान बांग्लादेश की आजादी के संघर्ष में पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दे रहे थे। जब पाकिस्तानी फौज पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुसलमानों पर जुल्म ढहा रही थी, ये नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान बंटे। यह सारा दृश्य मैंने युद्ध संवाददाता की हैसियत से 1970-71 में स्वयं अपनी आँखों से देखा है। इन्होंने 1971 के मुक्ति युद्ध के समय मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दिया था। तब से ही इन्हें बांग्लादेश में नफरत की निगाह से देखा जाता है। ये बांग्लादेश में अभी भी करीब 8-10 लाख की संख्या में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। ये पाकिस्तान जाना भी चाहते हैं पर इमरान खान की सरकार इन्हें अपने देश में लेने को तैयार नहीं है।
तो यह हाल है इमरान खान का। हालांकि इमरान खान की एक कैबिनेट मंत्री डॉ. शिरीन मजारी ने एक ट्वीट में कहा, “भारतीयों की पीड़ा को देखना दुखदायी है, क्योंकि वे कोरोना वायरस और ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं। हम सभी महामारी की घातक तीसरी लहर के बढ़ने पर इस संघर्ष में शामिल हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हममें से कई देशों ने मदद के बजाय सीमाएं सील कर दी हैं।” यह मानना होगा कि पाकिस्तान की आम जनता ने इस घोर संकट काल में भारत के प्रति सहानुभूति का ही भाव ही रखा। पाकिस्तान के सोशल मीडिया में भारत को लेकर दुआएं मांगी गई। यही होना चाहिए। दरअसल मानवता से ब़ड़ा कोई धर्म होता ही नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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