
जबलपुर। डिजिटल इंडिया, ऑनलाइन एजुकेशन और स्मार्ट लर्निंग के दौर में जहां देश के अधिकांश विश्वविद्यालय ई-लाइब्रेरी और डिजिटल संसाधनों से लैस हो चुके हैं, वहीं महाकौशल के सबसे बड़े विश्वविद्यालय रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (रादुविवि) में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आज तक ई-लाइब्रेरी शुरू नहीं हो सकी। परिणाम यह है कि हजारों विद्यार्थी आज भी वर्षों पुराने कंप्यूटरों और पारंपरिक पुस्तकालय व्यवस्था के सहारे पढ़ाई करने को मजबूर हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ई-लाइब्रेरी के लिए भवन बना, किताबों का डिजिटाइजेशन हुआ और करोड़ों रुपये खर्च किए गए, तो आखिर यह परियोजना बीच रास्ते में क्यों रुक गई? और यदि सरकारी धन खर्च हुआ तो उसका लाभ छात्रों तक आज तक क्यों नहीं पहुंचा?
यूजीसी की गाइडलाइन भी ठंडे बस्ते में
वर्ष 2021 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल संसाधनों को बढ़ावा देने के निर्देश दिए थे। गाइडलाइन के अनुसार विश्वविद्यालयों को अपने लगभग 40 प्रतिशत पाठ्यक्रम ऑनलाइन माध्यम से संचालित करने की दिशा में काम करना था। इसके लिए देशभर के कई विश्वविद्यालयों ने अपने आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और ई-लाइब्रेरी को मजबूत किया।लेकिन रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में इन निर्देशों का अपेक्षित पालन नहीं हो सका। आज भी अधिकांश विद्यार्थी आधुनिक डिजिटल शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित हैं।
करोड़ों की इमारत, लेकिन ई-लाइब्रेरी गायब
विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ वर्ष पहले करोड़ों रुपये खर्च कर एकात्म भवन का निर्माण कराया था। जानकारी के अनुसार इसी भवन में अत्याधुनिक ई-लाइब्रेरी विकसित की जानी थी। योजना के तहत सैकड़ों कंप्यूटर लगाए जाने थे और डिजिटल लाइब्रेरी का संचालन होना था। मौजूदा स्थिति यह है कि भवन का बड़ा हिस्सा खाली पड़ा है। कुछ हिस्सों में अन्य प्रशासनिक कार्य किए जा रहे हैं, जबकि कंप्यूटर विभाग को केवल सीमित कमरे उपलब्ध कराए गए हैं। जिस भवन को डिजिटल शिक्षा का केंद्र बनना था, वह अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है।
डिजिटल हुईं किताबें… लेकिन छात्र नहीं पढ़ पाए
विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय की हजारों पुस्तकों को स्कैन कर डिजिटल स्वरूप देने का कार्य भी कराया गया था। इसके पीछे उद्देश्य था कि विद्यार्थी कंप्यूटर या मोबाइल के माध्यम से कहीं से भी अध्ययन सामग्री प्राप्त कर सकें। लेकिन ई-लाइब्रेरी शुरू न होने के कारण यह पूरी कवायद छात्रों के लिए अब तक उपयोगी नहीं बन सकी।
200 कंप्यूटर खरीदने की योजना भी अधूरी
विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार ई-लाइब्रेरी के लिए करीब 200 नए कंप्यूटर खरीदने की योजना बनाई गई थी, ताकि छात्र आधुनिक तकनीक के साथ अध्ययन कर सकें। लेकिन यह योजना कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।आज भी विश्वविद्यालय के कई विभागों में 10 से 12 वर्ष पुराने कंप्यूटरों से काम चलाया जा रहा है। बीटेक, कृषि विज्ञान और अन्य प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों के छात्र भी आधुनिक कंप्यूटर लैब और डिजिटल संसाधनों का इंतजार कर रहे हैं।
सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों और शोधार्थियों को
यदि ई-लाइब्रेरी शुरू हो जाती तो विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पुस्तकें, रिसर्च पेपर, जर्नल और ऑनलाइन डेटाबेस एक क्लिक पर उपलब्ध हो सकते थे। शोधार्थियों को अध्ययन सामग्री के लिए भटकना नहीं पड़ता और विश्वविद्यालय की शोध गुणवत्ता में भी सुधार होता।इसके अलावा 24 घंटे ऑनलाइन अध्ययन, छुट्टियों में भी डिजिटल संसाधनों तक पहुंच और कागज की बचत जैसे अनेक लाभ छात्रों को मिल सकते थे।
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