
भोपाल। राजधानी में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन उनकी जांच के लिए उपलब्ध संसाधन उसी गति से नहीं बढ़े हैं। नतीजा यह है कि भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में एकमात्र इंस्पेक्टर पर 104 लंबित मामलों की जिम्मेदारी है। बढ़ते कार्यभार के कारण कई मामलों में एफआईआर दर्ज होने में ही दो-दो साल का समय लग रहा है, जबकि पीडि़तों की रकम वापस दिलाने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2021 में साइबर क्राइम यूनिट में 10 निरीक्षक स्तर के अधिकारी कार्यरत थे और लंबित मामलों की संख्या 47 थी। यानी एक निरीक्षक के पास औसतन चार से पांच केस थे। वहीं वर्ष 2026 में यूनिट में केवल एक निरीक्षक रह गया है और लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 104 पहुंच चुकी है। यानी पांच वर्षों में प्रति निरीक्षक कार्यभार लगभग 22 गुना बढ़ गया है। यूनिट में एसआई, एएसआई और आरक्षकों की संख्या मौजूद है, लेकिन साइबर धोखाधड़ी जैसे मामलों की विवेचना का अधिकार निरीक्षक स्तर से नीचे के अधिकारियों को नहीं है। दूसरी ओर हर महीने सैकड़ों शिकायतें मिल रही हैं और सालाना दर्ज होने वाले मामलों की संख्या 245 तक पहुंच चुकी है। इनमें ऑनलाइन फ्रॉड, डिजिटल अरेस्ट, निवेश ठगी और सोशल मीडिया हैकिंग जैसे मामले प्रमुख हैं।
डिजिटल जांच बन रही चुनौती
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराधों की जांच पारंपरिक अपराधों की तुलना में अधिक जटिल होती है। डिजिटल साक्ष्य जुटाना, आईपी ट्रैकिंग, सर्वर लोकेशन और अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की पड़ताल में लंबा समय लगता है। प्रशिक्षित साइबर विशेषज्ञों की कमी भी जांच को प्रभावित कर रही है।
सिस्टम की कमजोरियां बढ़ा रहीं जोखिम
जांच में सामने आया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक खाते खोलना, किराए पर खाते उपलब्ध कराना और बड़ी संख्या में सिम कार्ड जारी होना साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रहे हैं। इनका समय पर सत्यापन और निगरानी नहीं होने से ठगी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
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