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फ्रीबीज पर जल्द सुनवाई की मांग, CJI बोले- खाली समय में इसपर बात करेंगे

July 17, 2026

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक जनहित याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई. इस याचिका में चुनाव से पहले फ्रीबीज (चुनाव से पहले की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की घोषणा) पर रोक लगाने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि ऐसे वादे करने वाली राजनीतिक पार्टियों का चुनाव चिह्न जब्त किया जाए या उसका पंजीकरण रद्द किया जाए.

दरअसल जैसे ही चुनाव आते ही राजनीतिक दलों की तरफ से मुफ्त की सुविधाओं के तमाम वादे किए जाते हैं. फ्री बिजली, पानी जैसे कई तरह की घोषणाएं की जाती है. इसे ‘फ्रीबीज’ कहा जाता है. फ्रीबीज पर रोकने लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है.

याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच के समक्ष मामले पर जल्द सुनवाई की मांग की. उन्होंने बताया कि उनकी जनहित याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को 2022 में ही नोटिस जारी किए गए थे. उन्होंने कहा कि याचिका पर 5 फरवरी को तत्काल सुनवाई के आग्रह किया गया था. तब कोर्ट ने मार्च में सुनवाई करने पर सहमति जताई थी.

इस दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि जब हमारे पास फ़्रीबीज़ पर बात करने के लिए खाली समय होगा तब हम इस पर सुनवाई करेंगे. उन्होंने कहा कि अभी हमारे पास बहुत काम है. उन्होंने कहा कि यह मामला इंतजार कर सकता है. याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इस मामले को सुना जाना जरूरी है. उन्होंने कहा कि एक कमेटी बननी है और दोनों पक्ष कमेटी बनाने पर सहमत हो गए हैं, बस आपको मंज़ूरी देनी है. सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने भी उपाध्याय की जल्द सुनवाई की मांग का समर्थन किया.


  • इससे पहले 25 जनवरी 2022 को तत्कालीन CJI एनवी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र और चुनाव आयोग से इस जनहित याचिका पर जवाब मांगा था जिसमें चुनाव से पहले मुफ्त उपहार देने या वितरित करने वाली राजनीतिक पार्टी के चिन्ह को जब्त करने या उसे अपंजीकृत करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. बेंच ने इसे एक गंभीर मुद्दा करार दिया था. बेंच ने कहा था कि कई बार फ्रीबीज का बजट नियमित बजट से भी ज्यादा हो जाता है.

    याचिकाकर्ता अश्वनी कुमार दुबे ने याचिका में कोर्ट से यह घोषित करने का आग्रह किया गया कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से मुफ्त उपहारों का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बाधित करता है और चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को दूषित करता है. याचिका में केंद्र को इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है.

    याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनावों को ध्यान में रखते हुए मतदाताओं को मुफ्त उपहार देकर प्रभावित करने की राजनीतिक दलों की हालिया प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, बल्कि संविधान की भावना को भी चोट पहुंचाती है. याचिका में कहा गया कि यह अनैतिक प्रथा सत्ता में बने रहने के लिए सरकारी खजाने की कीमत पर मतदाताओं को रिश्वत देने के समान है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रथाओं को संरक्षित करने के लिए इससे बचना चाहिए.

    याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वह चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 के प्रासंगिक अनुच्छेदों में एक अतिरिक्त शर्त जोड़े, जो राज्य दल के रूप में मान्यता की शर्तों से संबंधित है, कि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से मुफ्त उपहारों का वादा/वितरण नहीं करेगा. याचिकाकर्ता ने कहा कि चुनावों से पहले सार्वजनिक धन से निजी वस्तुओं या सेवाओं का वादा करना या वितरण करना, जो सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए नहीं हैं, संविधान के कई अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है, जिसमें अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) भी शामिल है.

    याचिका में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले कुछ राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे वादों का जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि लोकतंत्र का आधार चुनावी प्रक्रिया है, और धन का वितरण और मुफ्त उपहारों का वादा खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, जिसके चलते कई बार चुनाव रद्द किए जा चुके हैं.

    याचिकाकर्ता का कहना है कि मुफ्त उपहारों के मनमाने वादे चुनाव आयोग के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के दायित्व का उल्लंघन करते हैं और सार्वजनिक धन से निजी वस्तुओं और सेवाओं का वितरण जो सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए नहीं हैं, संविधान के अनुच्छेद 14, 162, 266(3) और 282 का स्पष्ट उल्लंघन है.

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