
यरुशलम। इजरायल (Israel) में नई सरकार के गठन को लेकर जारी राजनीतिक खींचतान के बीच राष्ट्रपति इसाक हर्जोग (President Isaac Herzog) ने विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट (Gadi Eizenkot) को सरकार बनाने का पहला मौका देने का फैसला किया है। यह मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है। राष्ट्रपति रविवार, 8 नवंबर को स्थानीय समयानुसार शाम 5 बजे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में आइजेनकोट को औपचारिक रूप से सरकार बनाने का न्योता देंगे। इसके बाद उन्हें गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन का समय मिलेगा। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दे सकते हैं।
इजरायल में हाल ही में हुए चुनाव में नेतन्याहू के धार्मिक-राष्ट्रवादी गठबंधन को सबसे बड़ा राजनीतिक गुट होने के बावजूद संसद में बहुमत नहीं मिला। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद नेसेट में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। फिलहाल किसी भी गठबंधन के पास यह संख्या नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत तेज होने की संभावना है।
67 सांसदों ने आइजेनकोट के नाम का समर्थन किया
इजरायल में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से औपचारिक है, लेकिन चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए किस नेता को पहला मौका दिया जाए, यह तय करने में उनकी अहम भूमिका होती है। राष्ट्रपति हर्जोग ने फैसला लेने से पहले नेसेट में चुनी गई सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की।
इस दौरान 67 सांसदों ने प्रधानमंत्री पद के लिए गादी आइजेनकोट के नाम की सिफारिश की, जबकि 46 सांसदों ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सात सांसदों वाले एक दल ने किसी भी उम्मीदवार के नाम की सिफारिश नहीं की। राष्ट्रपति ने 5 नवंबर को परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद कहा था कि वह दलों के नेताओं से आगे बातचीत कर सरकार बनाने की संभावनाओं का आकलन करेंगे। इसके बाद 7 नवंबर को आइजेनकोट को जिम्मेदारी देने का फैसला घोषित किया गया।
हालांकि, 67 सांसदों का समर्थन मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आइजेनकोट के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मौजूद है। यह समर्थन उन्हें सबसे पहले गठबंधन बनाने का अवसर देता है। अब उन्हें अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के बीच सहमति बनानी होगी।
नेतन्याहू की लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत से दूर
चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने 27 सीटें जीतकर संसद में सबसे बड़ी पार्टी का स्थान हासिल किया। इसके बावजूद उनके गठबंधन को कुल 53 सीटें ही मिलीं, जो बहुमत के आंकड़े से आठ कम हैं।
दूसरी ओर, आइजेनकोट की याशर पार्टी ने 21 सीटें जीतीं। उनके साथ चार दलों वाले यहूदी गठबंधन के पास कुल 48 सीटें हैं। इजरायल के अरब अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली दो पार्टियों को मिलाकर 19 सीटें मिली हैं। राष्ट्रपति के साथ बातचीत के दौरान इन दोनों दलों ने भी आइजेनकोट के नाम का समर्थन किया।
सरकार बनाने के लिए आइजेनकोट के सामने तीन रास्ते
आइजेनकोट के सामने सरकार बनाने के कई विकल्प हैं, लेकिन हर रास्ते में राजनीतिक समझौते की जरूरत होगी। पहला विकल्प अरब सांसदों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बनाना है। दूसरा रास्ता उन अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों के साथ समझौता करना हो सकता है, जो अब तक परंपरागत रूप से नेतन्याहू के साथ रहे हैं।
तीसरा विकल्प लिकुड पार्टी के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का है। हालांकि, यह रास्ता भी आसान नहीं है। आइजेनकोट कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि वह नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं होंगे। वहीं, उनके संभावित सहयोगियों के बीच भी अरब दलों के समर्थन और अति-रूढ़िवादी पार्टियों की भूमिका को लेकर मतभेद हैं।
सहयोगियों के सामने रखीं चार शर्तें
आइजेनकोट ने संभावित सहयोगी दलों के सामने सरकार में शामिल होने के लिए चार प्रमुख शर्तें रखी हैं। उनका कहना है कि सहयोगी दल इजरायल को यहूदी, लोकतांत्रिक, उदार और समानता पर आधारित देश मानें। साथ ही इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा में बताए गए मूल्यों का सम्मान करें।
उनकी दूसरी प्रमुख शर्त सभी नागरिकों के लिए सैन्य या राष्ट्रीय सेवा का समर्थन करना है। इसके अलावा सहयोगी दलों को हमास को आतंकवादी संगठन मानना होगा और गाजा में उसकी सैन्य तथा शासन चलाने की क्षमता समाप्त करने के प्रयासों का समर्थन करना होगा।
इन शर्तों के चलते गठबंधन की बातचीत और जटिल हो सकती है। यदि आइजेनकोट निर्धारित समय में सरकार बनाने में नाकाम रहते हैं, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं। उसके बाद भी सरकार नहीं बनती है तो सांसद किसी अन्य उम्मीदवार का नाम आगे रख सकते हैं। पूरी प्रक्रिया के लिए इजरायल के पास करीब 100 दिन का समय है। इस अवधि में सरकार नहीं बन पाने की स्थिति में देश में फिर से चुनाव कराए जा सकते हैं।
नेतन्याहू ने राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की अपील की
आइजेनकोट को पहला मौका मिलने के बाद नेतन्याहू ने राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की अपील की है। हालांकि, उन्होंने ऐसी सरकार का विरोध किया है, जो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर हो।
नेतन्याहू ने आरोप लगाया कि जल्दबाजी में ऐसी सरकार बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे उनके मुताबिक आतंकवाद का समर्थन करने वाले दलों का साथ हासिल होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी सरकार इजरायल की सुरक्षा और हमास के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रभावी नहीं होगी। नेतन्याहू का दावा है कि अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर सरकार इजरायली सैनिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित नहीं कर पाएगी।
कौन हैं गादी आइजेनकोट?
66 वर्षीय गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख हैं। उन्होंने 2022 में राजनीति में कदम रखा था। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद वह कुछ समय के लिए नेतन्याहू की युद्धकालीन कैबिनेट में शामिल हुए थे, लेकिन बाद में सरकार से अलग होकर विपक्ष में लौट आए।
इसके बाद से वह गाजा युद्ध को संभालने के सरकार के तरीके और उसकी सुरक्षा नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। आइजेनकोट स्पष्ट कर चुके हैं कि वह नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं होंगे। गाजा युद्ध में उनके एक बेटे और दो भतीजों की मौत भी हुई थी।
चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने सैन्य अनुभव को प्रमुखता से सामने रखा और सुरक्षा के मुद्दे पर खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश किया। वह फलस्तीनी क्षेत्रों में इजरायली बस्तियों में रहने वाले लोगों की हिंसा की भी आलोचना करते रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने नेतन्याहू के दक्षिणपंथी सहयोगियों-राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर और वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच की नीतियों का विरोध किया है। फलस्तीनियों को लेकर उनके बयानों और कदमों के कारण कुछ पश्चिमी देशों ने इन दोनों नेताओं पर प्रतिबंध भी लगाए हैं।
अरब पार्टियों के समर्थन पर टिकी गठबंधन की गणित
इजरायल में नई सरकार के गठन में अरब सांसदों की भूमिका अहम हो गई है। आइजेनकोट ने अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन बनाने से इनकार किया है। ऐसे में उनके लिए इन 19 सीटों के आधार पर सीधे बहुमत हासिल करना मुश्किल है। हालांकि, इन पार्टियों ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम का समर्थन किया है, जिससे उन्हें सरकार बनाने का पहला मौका मिला है।
नेतन्याहू ने अरब पार्टियों के समर्थन को इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। वहीं, अरब नेताओं का आरोप है कि नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों की नीतियां अरब समुदाय के साथ भेदभाव करती हैं। इस बीच नेतन्याहू विरोधी दल नए गठबंधन की संभावनाएं तलाश रहे हैं और उन पार्टियों से भी बातचीत कर रहे हैं, जिनके साथ पहले समझौता मुश्किल माना जाता था।
यिसराइल बेतेनु पार्टी के नेता एविगडोर लिबरमैन ने भी अति-रूढ़िवादी पार्टियों के साथ काम करने को लेकर अपना पुराना विरोध नरम किया है। उन्होंने इस समुदाय के लोगों की सैन्य सेवा के मुद्दे पर समझौते की इच्छा जताई है। इससे नेतन्याहू विरोधी दलों के बीच नए गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, आइजेनकोट अब भी अति-रूढ़िवादी समुदाय के लोगों के लिए सैन्य या राष्ट्रीय सेवा अनिवार्य करने की मांग पर कायम हैं।
अब आगे क्या होगा?
आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका मिलने के बावजूद नेतन्याहू फिलहाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। उनकी लिकुड पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उनके गठबंधन के पास बहुमत नहीं है।
अब आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती 67 सांसदों के नामांकन संबंधी समर्थन को सरकार के पक्ष में जरूरी संसदीय बहुमत में बदलने की है। इसके लिए उन्हें मध्यमार्गी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, अरब और अति-रूढ़िवादी दलों के बीच सहमति बनानी होगी। यदि वह 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल होते हैं तो नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। वहीं, आइजेनकोट के असफल रहने पर नेतन्याहू को दोबारा सरकार बनाने का मौका मिल सकता है।
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