
नई दिल्ली। दीपावली (Diwali) पर घरों की सफाई, दीप प्रज्वलन और देवी लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) की पूजा सदियों से भारतीय परंपरा (Indian Tradition) का हिस्सा रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दीपावली पर लक्ष्मी पूजन की शुरुआत कैसे हुई? अगर यह पर्व भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी से जुड़ा है, तो इसमें धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की आराधना का महत्व कैसे जुड़ा? और देवी लक्ष्मी को धन की देवी के रूप में कब प्रतिष्ठा मिली?
इन सवालों के जवाब पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक शोध, दोनों में मिलते हैं। लक्ष्मी पूजा की परंपरा किसी एक घटना से शुरू नहीं हुई, बल्कि वैदिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, प्राचीन मूर्तिकला और लोक परंपराओं के मेल से धीरे-धीरे विकसित हुई।
वेदों में लक्ष्मी नहीं, ‘श्री’ के रूप में मिलता है उल्लेख
वैदिक साहित्य में देवी लक्ष्मी की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले ‘श्री’ शब्द पर ध्यान देना होगा। श्री का अर्थ तेज, सौंदर्य, प्रतिष्ठा, मंगल और ऐश्वर्य से जुड़ा है। धीरे-धीरे इसे ऐसी देवी के रूप में प्रतिष्ठा मिली, जो जीवन में कल्याण और संपन्नता प्रदान करती हैं।
ऋग्वेद से जुड़ा श्रीसूक्त इस मान्यता का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें देवी को हिरण्यमयी यानी सोने जैसी आभा वाली बताया गया है। श्रीसूक्त का एक प्रसिद्ध मंत्र है—
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
इसका भावार्थ है कि हे अग्निदेव! आप सुनहरी आभा वाली, तेजस्विनी, सोने-चांदी की माला से सुशोभित और चंद्रमा जैसी सुंदर कांति वाली लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें।
श्रीसूक्त में देवी से पशुधन, अन्न, कीर्ति और जीवन की संपन्नता की कामना भी की गई है। इस तरह ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ का संबंध समृद्धि, पोषण और सौभाग्य से स्थापित होता गया।
समुद्र मंथन से जुड़ी है लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा
वैदिक साहित्य में श्री और लक्ष्मी का संबंध समृद्धि से मिलता है, जबकि आगे चलकर वैष्णव और पौराणिक परंपराओं में देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में उनके प्रकट होने की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है।
श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, अमृत प्राप्त करने के प्रयास के दौरान क्षीरसागर का मंथन किया गया। इसी प्रक्रिया में देवी लक्ष्मी ‘श्रीदेवी’ के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया।
भगवान विष्णु को संसार का पालनहार माना जाता है। पालन-पोषण और व्यवस्था के लिए धन तथा संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसी धारणा के साथ लक्ष्मी का स्वरूप धन और ऐश्वर्य की देवी के रूप में भी स्थापित होता गया।
प्राचीन मूर्तियों में मिलने लगे लक्ष्मी पूजा के प्रमाण
देवी श्री और लक्ष्मी से जुड़े मूर्तिशिल्प के महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व से मिलने लगते हैं। मौर्यकाल में भी देवी श्री की पूजा के कुछ उल्लेख मिलते हैं, हालांकि उस समय उन्हें स्पष्ट रूप से लक्ष्मी नाम से नहीं पहचाना गया था।
मौर्यकाल के बाद शुंगकाल में पत्थरों पर देवी-देवताओं और मातृदेवियों की आकृतियां उकेरने की परंपरा विकसित हुई। स्तूपों, तोरणों और वेदिकाओं पर यक्ष, देव पुरुषों और मातृदेवियों के चित्रण मिलने लगे। इसी दौर में देवी श्री से जुड़े स्वरूप भी सामने आए।
हाथियों से अभिषेक वाली देवी बनीं गजलक्ष्मी
शुंगकालीन भरहुत स्तूप में एक देवी की आकृति मिली है, जिसके साथ ‘सिरिमा देवता’ का अभिलेख जुड़ा है। सिरिमा को श्री से संबंधित देवी माना गया है। इसी काल की मूर्तिकला में कमल पर खड़ी या बैठी स्त्री आकृतियां भी मिलती हैं, जिनके दोनों ओर हाथी जलाभिषेक करते दिखाई देते हैं। प्राचीन कलिंग की जैन गुफाओं में भी इस तरह के चित्रण मिले हैं।
हाथियों द्वारा अभिषेक किए जाने वाला यही स्वरूप आगे चलकर ‘गजलक्ष्मी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन मूर्तियों से संकेत मिलता है कि प्राचीन भारत में श्री को समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पहचान मिलने लगी थी। समय के साथ यह स्वरूप अधिक लोकप्रिय हुआ और लक्ष्मी की पूजा में कमल तथा हाथियों का विशेष महत्व स्थापित हो गया।
गुप्तकाल में राजवैभव का प्रतीक बनीं लक्ष्मी
चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकाल में देवी लक्ष्मी की प्रतिमा परंपरा का और विस्तार हुआ। इस दौर में जारी अनेक स्वर्ण मुद्राओं पर लक्ष्मी या श्री से जुड़ी आकृतियां दिखाई देती हैं। कहीं देवी सिंहासन पर विराजमान हैं, तो कहीं उनके हाथों में कमल है।
इस समय लक्ष्मी की अवधारणा केवल घरेलू सुख-समृद्धि तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजकीय वैभव और सत्ता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ गई। समृद्ध राज्य और वैभवशाली शासन की सांस्कृतिक कल्पना में श्री का महत्वपूर्ण स्थान बन गया।
कमल और हाथी क्यों बने समृद्धि के प्रतीक?
देवी लक्ष्मी के स्वरूप में कमल का विशेष महत्व है। वे कमल पर विराजमान दिखाई देती हैं और उनके हाथों में भी कमल होता है। भारतीय दर्शन और काव्य परंपरा में कमल सौंदर्य, पवित्रता और जीवन के विकास का प्रतीक रहा है। कीचड़ में खिलने के बावजूद अपनी निर्मलता बनाए रखने वाला कमल जीवन की सकारात्मकता और मंगल का संदेश देता है।
इसी तरह गजलक्ष्मी के साथ दिखाई देने वाले हाथी वर्षा, जल और धरती की उर्वरता के प्रतीक माने जाते हैं। प्राचीन भारतीय समाज में कृषि जीवन का प्रमुख आधार थी। ऐसे में जल, वर्षा और उपजाऊ भूमि का संबंध सीधे समृद्धि से जुड़ा हुआ था।
संस्कृत साहित्य में भी मिलते हैं दीपावली के उल्लेख
दीपावली के इतिहास को समझने के लिए प्राचीन संस्कृत साहित्य भी महत्वपूर्ण है। सांस्कृतिक इतिहासकार पी. के. गोडे ने अपने शोध ‘द हिस्ट्री ऑफ दिवाली फेस्टिवल’ में इस पर्व की प्राचीन परंपराओं का अध्ययन किया है। वहीं धर्मशास्त्र के विद्वान पी. वी. काणे ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र’ में दीपावली से जुड़ी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का उल्लेख किया है।
वात्स्यायन के कामसूत्र में ‘यक्षरात्रि’ नामक उत्सव का जिक्र मिलता है। यक्षों का संबंध धन के देवता कुबेर से माना जाता है। इसी वजह से कुछ विद्वान यक्षरात्रि को दीपावली की शुरुआती परंपराओं से जोड़ते हैं। हालांकि, इसे वर्तमान दीपावली जैसा ही पर्व मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। 12वीं शताब्दी के विद्वान हेमचंद्र की रचना ‘देशीनाममाला’ में भी यक्षरात्रि और दीपावली के संबंध का संकेत मिलता है।
नीलमतपुराण और हर्ष के नाटक में दीपोत्सव का वर्णन
कश्मीर के प्राचीन ग्रंथ ‘नीलमतपुराण’ में दीपमाला उत्सव का वर्णन मिलता है। इसमें कार्तिक अमावस्या पर दीप जलाने और देवी लक्ष्मी की आराधना की परंपरा का उल्लेख है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां दीपोत्सव और लक्ष्मी पूजा एक साथ दिखाई देते हैं।
सातवीं शताब्दी के सम्राट हर्षवर्धन के संस्कृत नाटक ‘नागानंद’ में भी दीपोत्सव का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में दीप जलाकर उत्सव मनाने की परंपरा काफी पुरानी रही है।
इस तरह दीपावली का विकास किसी एक पौराणिक कथा के आधार पर नहीं हुआ। समय के साथ इसमें भगवान राम की अयोध्या वापसी, देवी लक्ष्मी की आराधना और सुख-समृद्धि की कामना जैसी अलग-अलग मान्यताएं जुड़ती गईं।
दीपावली पर लक्ष्मी पूजा कब शुरू हुई, इसका निश्चित प्रमाण नहीं
लक्ष्मी आराधना की प्राचीनता और दीपावली पर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत को एक ही ऐतिहासिक घटना मानना सही नहीं होगा। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दीपोत्सव के साथ कई धार्मिक कथाएं और परंपराएं जुड़ी हैं। कहीं इसे भगवान राम की अयोध्या वापसी से जोड़ा जाता है, तो कहीं भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा से। कुछ क्षेत्रों में राजा बलि और यमदीपदान की परंपराएं भी दीपावली का हिस्सा हैं।
इन्हीं विविध मान्यताओं के बीच कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी आराधना का महत्व बढ़ता गया। घरों की सफाई, दीप जलाना, द्वारों की सजावट और देवी का आवाहन शुभता तथा समृद्धि से जुड़ गए। व्यापारिक समुदायों में बहीखातों की पूजा और आर्थिक वर्ष की शुरुआत जैसी परंपराओं ने भी दीपावली को विशेष पहचान दी।
हालांकि, वर्तमान स्वरूप में दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा की शुरुआत किस शताब्दी में हुई, इसका कोई एक निश्चित और सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। माना जाता है कि यह परंपरा विभिन्न धार्मिक और सामाजिक धाराओं के मेल से विकसित हुई।
लक्ष्मी के साथ गणेश पूजा का क्या है अर्थ?
दीपावली पर देवी लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा भी व्यापक रूप से की जाती है। लक्ष्मी समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक हैं, जबकि गणेश बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों के निवारण के देवता माने जाते हैं।
दोनों की संयुक्त आराधना के पीछे यह भावना है कि जीवन में केवल धन पर्याप्त नहीं है। संपत्ति के उचित उपयोग के लिए बुद्धि, विवेक और संयम भी जरूरी हैं। इसी विचार के साथ दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा की परंपरा लोकप्रिय हुई।
देश के अलग-अलग हिस्सों में लक्ष्मी आराधना के अलग रूप
भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण देवी लक्ष्मी की पूजा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में होती है। बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में दीपावली पर लक्ष्मी पूजन प्रमुख है। दक्षिण भारत के अनेक समुदायों में वरलक्ष्मी व्रत की परंपरा प्रचलित है, जिसमें परिवार के कल्याण और सौभाग्य की कामना की जाती है।
बंगाल में लक्ष्मी पूजा का प्रमुख पर्व दीपावली के बजाय विजयादशमी के बाद आने वाली शरद पूर्णिमा है। इसे ‘कोजागरी पूजा’ कहा जाता है। यह परंपरा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वी भारत के अन्य क्षेत्रों में भी प्रचलित है।
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है। ‘कोजागरी’ शब्द संस्कृत के ‘को जागृति’ यानी ‘कौन जाग रहा है’ से जुड़ा है। इस अवसर पर भक्त रातभर जागरण करते हैं, घरों में दीप जलाते हैं, अल्पना बनाते हैं और देवी को भोग अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
सिर्फ धन नहीं, संपूर्ण जीवन की समृद्धि का प्रतीक हैं लक्ष्मी
देवी लक्ष्मी की अवधारणा केवल धन तक सीमित नहीं है। वैदिक साहित्य में अन्न, पशुधन और सौभाग्य की कामना से लेकर पुराणों में दिव्य श्री और लोकजीवन में गृहलक्ष्मी की मान्यता तक उनका स्वरूप लगातार व्यापक होता गया।
भारतीय समाज में समृद्धि का अर्थ केवल तिजोरी में रखी संपत्ति नहीं रहा। अन्न से भरा भंडार, परिवार का सुख, खेती की उन्नति, अतिथि का स्वागत और जीवन में मंगल की उपस्थिति भी संपन्नता के प्रतीक माने गए। इसी कारण लक्ष्मी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में जीवन को सुंदर, समर्थ और समृद्ध बनाने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
वेदों की ‘श्री’ से शुरू हुई यह परंपरा पुराणों में विष्णुप्रिया के स्वरूप तक पहुंची और प्राचीन शिल्पकला में गजलक्ष्मी के रूप में दिखाई दी। समय के साथ दीपावली के दीपों के बीच देवी लक्ष्मी घर-घर की आराध्य बन गईं। इसलिए कार्तिक अमावस्या की रात होने वाली लक्ष्मी पूजा केवल धन की कामना नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण समृद्धि और मंगल की कामना से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा भी है।
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