
जबलपुर। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को निशुल्क आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था होने के बावजूद जमीनी हकीकत इससे उलट है। जिले के बड़े अस्पतालों से लेकर स्वास्थ्य केंद्रों तक जरूरी दवाओं की कमी बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक कई अस्पतालों में समय-समय पर 30 से 40 फीसदी तक आवश्यक दवाओं का स्टॉक उपलब्ध नहीं रहता। ऐसे में डॉक्टरों को भी मजबूरी में मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की सलाह देनी पड़ रही है। केंद्र और राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों के स्तर के अनुसार आवश्यक दवाओं की सूची और उपलब्धता का प्रावधान तय किया है। इसके बावजूद दवा स्टोर में स्टॉक खत्म होने से मरीजों की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है। अस्पताल प्रबंधन दवाओं की कमी स्वीकार तो करते हैं, लेकिन इसके कारणों और जिम्मेदारी को लेकर खुलकर बोलने से बचते नजर आते हैं।
इंडेंट तीन माह पहले, फिर भी क्यों खाली स्टोर?
व्यवस्था के अनुसार दवाओं का स्टॉक खत्म होने से पहले आगामी करीब तीन माह की जरूरत का इंडेंट भेजा जाना चाहिए, ताकि सप्लाई बाधित न हो। इसके बावजूद यदि समय पर मांग नहीं भेजी जाती या आपूर्ति में देरी होती है तो अस्पताल में दवाओं का टोटा शुरू हो जाता है और इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ता है। दवाओं की कमी के पीछे बजट, टेंडर प्रक्रिया में देरी, सप्लाई में व्यवधान और समय पर इंडेंट नहीं भेजे जाने जैसे कारण बताए जा रहे हैं।
भोपाल से खरीदी, अस्पताल को 20 फीसदी स्थानीय खरीद की छूट
प्रदेश में सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं की खरीद मुख्य रूप से दो स्तरों पर होती है। राज्य स्तर पर भोपाल से केंद्रीकृत खरीद के जरिए अस्पतालों को दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। वहीं तत्काल जरूरत की स्थिति में अस्पतालों को निर्धारित सीमा तक स्थानीय खरीद की अनुमति है, ताकि जरूरी दवाओं की कमी दूर की जा सके।
डॉक्टर भी मजबूर, मरीज की जेब पर पड़ रहा भार
डॉक्टरों को अनावश्यक रूप से बाहर की दवाएं लिखने से बचने के निर्देश हैं। लेकिन अस्पताल के स्टोर में दवा उपलब्ध नहीं होने पर उपचार प्रभावित न हो, इसके लिए डॉक्टरों को मरीज या उसके परिजनों को बाजार से दवा लेने की सलाह देनी पड़ती है। यानी सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचा मरीज अंतत: मेडिकल स्टोर पर अपनी जेब ढीली करने को मजबूर हो जाता है। अब सवाल व्यवस्था पर है—जब दवाओं की सूची तय है, इंडेंट की व्यवस्था है और ऑनलाइन निगरानी भी है, तो फिर अस्पतालों में 30-40 फीसदी दवाएं गायब क्यों हैं? जरूरत है कि अस्पतालवार दवा स्टॉक का नियमित सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए, आउट ऑफ स्टॉक दवाओं का विवरण सार्वजनिक किया जाए और कमी के लिए जिम्मेदारी तय की जाए। इस संबंध में सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।
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