
नई दिल्ली. पश्चिम एशिया (West Asia) में जंग को करीब एक महीना हो गया है. और इस दौरान कश्मीर घाटी (Kashmir Valley) में ईरान (Iran) के लिए दान का सिलसिला तेजी से बढ़ा है. लेकिन इस मदद के साथ-साथ खुफिया एजेंसियों (Intelligence Agencies) की चिंता भी बढ़ती जा रही है.
सरकारी अनुमान के मुताबिक कश्मीर घाटी में अब तक ईरान के लिए 17.91 करोड़ रुपये जमा हो चुके हैं. यह पैसा जकात और सदका जैसी धार्मिक जिम्मेदारियों के तहत दिया जा रहा है. दान देने वालों में 85 फीसदी शिया समुदाय के लोग हैं. सबसे ज्यादा 9.5 करोड़ रुपये अकेले बडगाम जिले से आए हैं.
दान की इस भारी बाढ़ को देखते हुए ईरानी दूतावास ने एक नया बैंक अकाउंट और UPI नंबर भी जारी कर दिया है. इससे आने वाले दिनों में यह रकम और बढ़ने की उम्मीद है.
खुफिया एजेंसियां क्यों चिंतित हैं?
ज्यादातर लोग दिल से और सच्ची भावना से दान दे रहे हैं. इस पर किसी को शक नहीं. लेकिन खुफिया एजेंसियों का कहना है कि करीब आधा पैसा गलत हाथों में जा सकता है.
वजह यह है कि बहुत सारे बिचौलिए और संदिग्ध संगठन नकद में पैसा जमा कर रहे हैं. इनमें से कई का न कोई हिसाब-किताब है, न कोई जवाबदेही. और कई मामलों में तो सोना-चांदी, तांबे के बर्तन और मवेशी तक दान में आ रहे हैं. जिन्हें संभालना और उनका हिसाब रखना बेहद मुश्किल है. खुफिया सूत्रों ने चेताया है कि यह पैसा कट्टरपंथी गतिविधियों, अलगाववादी प्रचार या भारत विरोधी कामों में इस्तेमाल हो सकता है.
सरजान बरकती वाला सबक
खुफिया अधिकारियों ने दक्षिण कश्मीर के मौलवी सरजान बरकती का उदाहरण दिया. 2016 की हिंसक आंदोलन के दौरान उन्होंने भावनात्मक अपील करके लोगों से 1.5 करोड़ से ज्यादा जमा किए थे. बाद में जांच में पाया गया कि इस पैसे का इस्तेमाल व्यक्तिगत संपत्ति बनाने और आतंकी नेटवर्क को चलाने में हुआ. कई दानदाता खुद जांच के दायरे में आए और कुछ के पासपोर्ट तक रोक दिए गए. अधिकारियों ने चेताया, “लोग किसी नेक काम के लिए पैसे देते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि पैसा सच में उस काम में जाएगा या नहीं.”
ईरानी नेटवर्क और कश्मीरी मौलवी
खुफिया रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कश्मीर के कई शिया धर्मगुरुओं को ईरानी संस्थाओं से पहले से आर्थिक मदद मिलती है. यह पैसा श्रीनगर के बागवानपोरा के हकीम साजाद के जरिए बंटता बताया जाता है.
इसके अलावा ईरान ने लंबे समय से कश्मीर में अपना प्रभाव बनाने की कोशिश की है. स्कॉलरशिप देकर, कश्मीरी युवाओं को कोम और मशहद के मदरसों में पढ़ाकर. वहां से लौटने वाले युवा इमाम और प्रचारक बनकर यहां की सोच को प्रभावित करते हैं.
यही वजह है कि जब 1 मार्च को अयातुल्ला खामेनेई के मारे जाने की खबर आई तो कश्मीर में जो विरोध प्रदर्शन हुए, उनमें पहले से तैयार हिजबुल्लाह के झंडे दिखे. यह सहज भावना नहीं थी यह एक संगठित नेटवर्क का संकेत था.
क्या करें, क्या न करें?
खुफिया अधिकारियों की सलाह साफ है है कि सीधे ईरानी दूतावास के बैंक खाते में पैसा जमा करें. इससे पैसा सही जगह पहुंचने की गारंटी ज्यादा है. किसी भी स्थानीय संगठन या बिचौलिए को नकद देने से बचें. खासकर उनसे जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है. कई नेताओं को लोगों को सतर्क करने के लिए भी कहा गया है.
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