नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों (Glaciers) के पिघलने के साथ ग्लेशियल झीलों (Glacial lakes) का विस्तार और उनसे जुड़े संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ रही है। वर्ष 2026 में सामने आए उपग्रह आधारित अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया (Glacial lakes) में ग्लेशियर झीलों के कुल क्षेत्रफल में वर्ष 2016-17 के बाद से 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलें ऐसी पाई गई हैं, जिनके आकार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इनमें 130 झीलें भारत में स्थित हैं।
अध्ययन के अनुसार भारत में विस्तार वाली इन झीलों में 65 सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियल झीलों का विस्तार इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि कुछ झीलें बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित होती हैं। ऐसे बांध टूटने की स्थिति में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आने से बाढ़ और तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।
नए उपग्रह अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। वर्ष 2016-17 के मुकाबले इनके कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि सामने आई है।
अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों के विस्तार को विशेष रूप से उल्लेखनीय पाया गया है। इस क्षेत्र में अकेले झीलों का क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।
ग्लेशियल झीलें आम तौर पर ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने से बनती हैं। इनमें से कई झीलें प्राकृतिक रूप से बर्फ, चट्टान या मलबे से बने बांधों से घिरी होती हैं।
इसरो के पुराने आंकड़े भी दे रहे चेतावनी
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित पुराने अध्ययन में भी भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार की तस्वीर सामने आ चुकी है।
इसरो ने 1984 से अब तक के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया था। इनमें से 676 झीलों के आकार में 1984 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इन 676 झीलों में 130 भारत में स्थित थीं। अध्ययन के अनुसार इनमें से 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो चुका था। यह बदलाव हिमालयी क्षेत्र में जलवायु और ग्लेशियरों में हो रहे परिवर्तन से जुड़े संभावित जोखिम की ओर संकेत करता है।
26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों पर नजर
इसरो मानसून के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार निगरानी कर रहा है। इसके तहत एनएचपीसी की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियल झीलों की निगरानी की जा रही है।
उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से झीलों के आकार, जलस्तर और आसपास के भूगर्भीय बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलती है। इससे संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
ग्लेशियर झीलों के साथ भूस्खलन का खतरा भी
हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार के साथ भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा हुआ है। भारी बारिश, चट्टानों का खिसकना और पहाड़ी ढलानों में होने वाले बदलाव कई बार ग्लेशियल झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
इसरो के उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार हिमालयी पर्वत श्रृंखला में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
ग्लेशियर झीलों का बढ़ता विस्तार, प्राकृतिक बांधों की अस्थिरता और भूस्खलन का मेल हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ-साथ जलविद्युत परियोजनाओं और निचले इलाकों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, समय पर चेतावनी और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी को और मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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