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ईरान के सस्ते तेल पर भारत की नजर, अमेरिकी राहत के बाद खुला नया मौका

June 24, 2026

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान (US and Iran) के बीच बढ़ती कूटनीतिक नरमी का असर अब वैश्विक तेल बाजार (Global Oil Market) में दिखाई देने लगा है। दोनों देशों के बीच शांति समझौते की दिशा में बढ़ती बातचीत और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। इसी बीच ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली अस्थायी राहत ने भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए नया विकल्प खोल दिया है।

अमेरिका ने ईरान को 21 अगस्त 2026 तक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की सीमित अनुमति दी है। करीब आठ वर्षों बाद मिली इस छूट के बाद ईरान वैश्विक बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिशों में जुट गया है। इसके तहत भारतीय, जापानी और दक्षिण कोरियाई रिफाइनरों से संपर्क साधा जा रहा है, ताकि लंबे समय से समुद्र में खड़े तेल टैंकरों के लिए खरीदार मिल सकें।

ब्लूमबर्ग और वोर्टेक्सा के आंकड़ों के अनुसार, 22 जून तक समुद्र में लगभग 6.8 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल और कंडेनसेट मौजूद था। इनमें से करीब 85 प्रतिशत कार्गो का कोई तय गंतव्य नहीं है। ईरान अब इन खेपों के लिए नए बाजार तलाश रहा है और भारत उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। भारतीय तटों के निकट मौजूद इन टैंकरों से आपूर्ति करना अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला हो सकता है।

ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल भंडार है। लगभग 209 अरब बैरल के अनुमानित भंडार वाला यह देश अब तक अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण सीमित बाजारों, विशेषकर चीन, पर निर्भर था। प्रतिबंधों में मिली ढील के बाद तेहरान अपने निर्यात नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है।

हालांकि भारत के लिए ईरानी तेल खरीदना उतना आसान नहीं दिख रहा। होर्मुज संकट के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की व्यवस्था कर ली थी। रूस से लगातार तेल आपूर्ति जारी है, जबकि अमेरिका और वेनेजुएला से भी आयात किया जा रहा है। ऐसे में अचानक सप्लायर बदलने की जरूरत फिलहाल महसूस नहीं की जा रही।



  • विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राहत केवल 60 दिनों के लिए है, जिससे खरीदारों में अनिश्चितता बनी हुई है। इसके अलावा यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने अभी भी ईरानी तेल पर प्रतिबंध लागू कर रखे हैं। इससे बीमा, वित्तपोषण और शिपिंग से जुड़ी कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं। कई बंदरगाह ऐसे भी हैं जो तथाकथित ‘डार्क फ्लीट’ से जुड़े जहाजों को स्वीकार करने में हिचकिचा रहे हैं।

    ऊर्जा विश्लेषण कंपनी Kpler के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग लीड एनालिस्ट सुमित रिटोलिया का कहना है कि चीन के अलावा अन्य देशों द्वारा ईरानी तेल की खरीद में बड़े उछाल की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है। उनका तर्क है कि अधिकांश रिफाइनरियां दो से तीन महीने पहले ही आयात योजनाएं तय कर लेती हैं और अगस्त तक की जरूरतों के लिए अनुबंध पहले से किए जा चुके हैं।

    ऐसे में भारत द्वारा बड़े पैमाने पर ईरानी तेल खरीदने की संभावना फिलहाल सीमित नजर आती है। हालांकि यदि ईरान आकर्षक छूट और प्रतिस्पर्धी कीमतों की पेशकश करता है, तो भारतीय कंपनियां अवसर का लाभ उठाने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल करोड़ों बैरल तेल से भरे ईरानी टैंकर खरीदारों की तलाश में समुद्र में इंतजार कर रहे हैं।

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