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इंदौर: बनती और बिकती रही मिलावटी शराब, सोता रहा खाद्य विभाग

July 12, 2026

पिछले पांच साल में शराब के सिर्फ तीन सैंपल लिए, तीनों ही फेल निकले, प्रदेश के अन्य जिलों का भी यही हाल
खाने-पीने की ही तरह शराब की जांच भी खाद्य विभाग की जिम्मेदारी, पहले से जांच होती तो सालों पहले पकड़ी जा चुकी होती गड़बड़ी

इंदौर। विकाससिंह राठौर
देशभर में शराब (liquor) की गुणवत्ता और लेबलिंग को लेकर उठे सवालों के बीच अब खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफएसएसएआई के प्रवर्तन से जुड़ा राज्य अमला) की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। खाने-पीने की वस्तुओं के हजारों सैंपल (Sample) हर साल लेने वाला विभाग शराब की नियमित जांच को लगभग नजरअंदाज करता रहा। अधिकारी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े सोते रहे। नतीजा यह हुआ कि वर्षों तक बाजार में ऐसी शराब बिकती रही, जिसमें लेबलिंग और गुणवत्ता संबंधी गंभीर गड़बड़ियां होने के बावजूद उन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो सकी।


  • उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2025 में महाराष्ट्र के खपोली में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा देश में सर्वाधिक बिकने वाली ओल्ड मोंक रम के सैंपल लिए थे। इसमें से तीन सैंपल जांच में फेल हो गए। इसके बाद एफएसएसएआई ने इस फैक्ट्री में निर्मित फेल हुए सैंपलों की बिक्री पर रोक लगा दी, जिसके बाद महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में ओल्ड मोंक मिलना ही बंद हो गई। जांच में पाया गया कि उक्त ब्रांड ओरिजिनल रम के बजाए रम का फ्लेवर मिलाकर शराब तैयार कर रहा था। साथ ही एजिंग से जुड़े दावे भी गलत पाए गए। इस कार्रवाई के खिलाफ कंपनी कोर्ट पहुंची है और मामला अभी विचाराधीन है। इस बीच एफएसएसएआई ने देश में अलग-अलग शराब की जांच का अभियान भी शुरू कर दिया, जिसके तहत इंदौर में भी 6 शराबों के सैंपल लेकर जांच के लिए मुंबई स्थित लैब में भेजा गया है। इस पूरे मामले में खाद्य औषधि प्रशासन विभाग भी सवालों के घेरे में है। अगर खाद्य विभाग नियमित रूप से शराब के भी नमूने लेकर उनकी जांच कराता, तो ऐसी गड़बड़ियां वर्षों पहले सामने आ सकती थीं और उपभोक्ताओं तक संदिग्ध उत्पाद पहुंचने से पहले ही उन पर रोक लग जाती।

    पांच साल में सिर्फ तीन सैंपल, वह भी शिकायत के बाद
    जानकारी के अनुसार इंदौर में पिछले पांच वर्षों के दौरान खाद्य विभाग ने शराब के केवल तीन नमूने लिए। इनमें भी कोई नियमित अभियान नहीं चलाया गया, बल्कि उपभोक्ताओं की शिकायत मिलने के बाद ही कार्रवाई करनी पड़ी। किसी मामले में एक्सपायरी बीयर बेचे जाने की शिकायत मिली, तो नमूना लिया गया, कहीं गुणवत्ता को लेकर शिकायत आई तो जांच की गई। यानी विभाग ने स्वयं पहल कर शराब की गुणवत्ता की निगरानी लगभग नहीं की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों नमूने भी जांच में मानकों पर खरे नहीं उतरे और फेल हो गए। इनके मामले फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि शिकायत आधारित जांच में भी गड़बड़ियां सामने आती रही हैं। प्रदेश के अन्य जिलों का हाल भी इंदौर जैसा ही है।

    लोगों को भ्रम, पूरी जिम्मेदारी आबकारी की नहीं
    आम लोगों की धारणा रहती है कि शराब से जुड़ा हर काम आबकारी विभाग देखता है, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग है। शराब के लाइसेंस, बिक्री और राजस्व संबंधी व्यवस्थाएं भले आबकारी विभाग के अधीन हों, लेकिन शराब की गुणवत्ता, मानक, लेबलिंग और उपभोक्ता को सही जानकारी उपलब्ध कराना खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खाद्य विभाग की जिम्मेदारी है। यही कारण है कि हाल के मामलों में भी जांच खाद्य सुरक्षा कानून के तहत की गई और लेबलिंग में गड़बड़ियां सामने आने के बाद कार्रवाई शुरू हुई। जबकि जानकारी के अभाव में अकसर शराब से जुड़ी कोई भी शिकायत होने पर ज्यादातर लोग आबकारी विभाग को शिकायत करते हैं और विभाग भी अपने अधिकार क्षेत्र तक कार्रवाई कर पाता है।

    हजारों खाद्य सैंपल, लेकिन शराब पर चुप्पी
    खाद्य विभाग हर वर्ष दूध, घी, तेल, मसाले, मिठाई, नमकीन सहित अन्य खाद्य पदार्थों के हजारों नमूने लेकर जांच करता है। त्योहारों और विशेष अभियानों के दौरान तो लगातार सैंपलिंग होती है। इसी प्रकार शराब भी खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में गुणवत्ता और लेबलिंग संबंधी नियमों के पालन के लिए आती है, लेकिन इस क्षेत्र में नियमित निगरानी लगभग नहीं के बराबर रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शराब के भी नियमित सैंपल लिए जाते, तो हाल ही में सामने आए लेबलिंग और गुणवत्ता संबंधी मामले शायद वर्षों पहले उजागर हो जाते।

    अधिकारियों का तर्क – शराब के सैंपल लेना आसान नहीं
    विभागीय अधिकारियों का कहना है कि शराब के नमूने लेना सामान्य खाद्य पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण काम है। ऐसे मामलों में कई तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि अधिकारी अक्सर शिकायत मिलने पर ही कार्रवाई करते हैं। अधिकारियों का यह भी कहना है कि मुख्यालय और एफएसएसएआई की ओर से खाद्य पदार्थों के सैंपलिंग अभियान को लेकर लगातार निर्देश जारी होते रहते हैं, लेकिन शराब के लिए इस तरह के नियमित विशेष अभियान या लक्ष्य निर्धारित नहीं किए जाते। इसके चलते शराब की सैंपलिंग प्राथमिकता में नहीं आ पाती।

    खाद्य विभाग की जिम्मेदारी क्या है?
    खाद्य एवं पेय पदार्थों की गुणवत्ता की जांच।
    लेबलिंग और मानकों का पालन सुनिश्चित करना।
    संदिग्ध उत्पादों के नमूने लेकर लैब जांच कराना।
    मानक पूरे नहीं होने पर प्रतिबंध और कानूनी कार्रवाई करना।
    उपभोक्ताओं को सुरक्षित और सही जानकारी वाले उत्पाद उपलब्ध कराना।

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