न्यूयॉर्क । संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 39वें विशेष सत्र में कल एक बड़ा भू-राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला। ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए निंदा प्रस्ताव पर भारत ने खुलकर तेहरान (iran) का साथ दिया। भारत ने न केवल इस प्रस्ताव का विरोध किया, बल्कि ‘NO’ (विपक्ष में) वोट डालकर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय गुट को चौंका दिया है।
वोटिंग का गणित: कौन किसके साथ?
वोटिंग के दौरान असेंबली हॉल का माहौल तनावपूर्ण था। स्क्रीन पर आए नतीजों ने दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया।
कुल वोटिंग परिणाम:
प्रस्ताव के पक्ष में (YES): 25 वोट
तटस्थ रहे (ABSTAIN): 14 वोट
प्रस्ताव के खिलाफ (NO): 07 वोट
भारत उन चुनिंदा 7 देशों में शामिल रहा जिन्होंने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज (NO) कर दिया।
भारत का ईरान को खुला समर्थन (‘NO’ खेमा)
भारत ने अपनी पारंपरिक कूटनीति से हटकर इस बार ‘Abstain’ (तटस्थ) रहने के बजाय सीधे ‘NO’ वोट किया। इस खेमे में भारत के साथ ये देश भी शामिल थे:
भारत
चीन
इंडोनेशिया
पाकिस्तान
इराक
वियतनाम
क्यूबा
यह एक दुर्लभ अवसर था जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत, चीन और पाकिस्तान एक ही सुर में (ईरान के पक्ष में) वोट करते नजर आए।
पश्चिमी देशों का गठबंधन (‘YES’ खेमा)
अमेरिका (पर्दे के पीछे से) और यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए पूरा जोर लगाया था। कुल 25 देशों ने पक्ष में वोट किया, जिनमें प्रमुख थे:
भारत के ‘NO’ वोट के मायने
आमतौर पर, भारत मानवाधिकारों से जुड़े देश-विशेष प्रस्तावों पर ‘तटस्थ’ रहने की नीति अपनाता है। लेकिन इस बार ‘NO’ वोट करना भारत की विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पश्चिमी दबाव में नहीं आएगा। ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध हैं, साथ ही ‘चाबहार पोर्ट’ जैसी रणनीतिक परियोजनाएं भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत ने इंडोनेशिया, वियतनाम और इराक जैसे एशियाई देशों के साथ मिलकर यह संदेश दिया है कि मानवाधिकारों के नाम पर किसी देश के आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह कदम पश्चिमी देशों के ‘दोहरे मापदंड’ के खिलाफ एक कड़ा संदेश है।
हालांकि 25 वोटों के बहुमत से यह प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे बड़े एशियाई देशों का विरोध (NO) करना इस प्रस्ताव की नैतिक जीत को कमजोर करता है। पश्चिमी देश भारत के इस कदम को ईरान के साथ अपनी बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के रूप में देख रहे हैं।
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