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मक्का में सऊदी तुर्किए पाकिस्तान की बड़ी डिफेंस डील से ईरान नाराज, सुरक्षा समझौते पर सांसद ने उठाए गंभीर सवाल

August 08, 2026


नई दिल्ली । सऊदी अरब (Saudi Arabia), तुर्किए (Turkiye) और पाकिस्तान (Pakistan) के बीच मक्का में हुआ संयुक्त रक्षा समझौता (Defense Agreement) पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक परिस्थितियों के बीच बेहद अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। तीनों देशों के बीच हुए इस समझौते में आपसी सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की बात कही गई है। समझौते के अनुसार, यदि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस घोषणा के बाद ईरान (Iran) की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरानी सांसद इब्राहिम रजाई ने सऊदी अरब की इस पहल पर सवाल उठाते हुए कहा है कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ किया गया कागजी समझौता सऊदी अरब को वास्तविक सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता।

मक्का में हुए इस महत्वपूर्ण समझौते में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल रहे। तीनों देशों की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदल रही है और क्षेत्रीय शक्तियां अपने रणनीतिक संबंधों को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे माहौल में सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान का एक साथ आना क्षेत्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के सदस्य इब्राहिम रजाई ने इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि सऊदी अरब को यह समझना चाहिए कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ कागज पर समझौता करने से उसकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। उन्होंने सऊदी अरब की पिछली सुरक्षा नीति का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों के बावजूद सुरक्षा संबंधी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। उनके मुताबिक सऊदी अरब को अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए और सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए।

हालांकि सऊदी अरब ने इस समझौते को किसी सैन्य गुट या सांप्रदायिक गठबंधन की शुरुआत के तौर पर पेश नहीं किया है। सऊदी पक्ष का कहना है कि इस रक्षा समझौते का उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है। यह तीनों देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए किया गया है। सऊदी अरब ने यह भी संकेत दिया है कि इस समझौते से उसके खाड़ी, अरब और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद रणनीतिक संबंध प्रभावित नहीं होंगे।

तुर्किए ने भी समझौते को रक्षात्मक प्रकृति का बताया है। तुर्किए के अनुसार इसका उद्देश्य किसी एक देश या किसी विशेष समूह को निशाना बनाना नहीं है। साथ ही भविष्य में दूसरे क्षेत्रीय देशों के इसमें शामिल होने की संभावना भी बताई गई है। यदि ऐसा होता है तो यह समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग के बड़े ढांचे का रूप ले सकता है।

इस साझेदारी में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के पास सैन्य अनुभव और बड़ी रक्षा क्षमता है, सऊदी अरब आर्थिक रूप से मजबूत देश है और तुर्किए आधुनिक रक्षा तकनीक तथा सैन्य उद्योग के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। इन तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताएं एक-दूसरे के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी साबित हो सकती हैं। रक्षा सहयोग बढ़ने पर सैन्य प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और सुरक्षा समन्वय जैसे क्षेत्रों में भी आगे बढ़ने की संभावना है।


  • ईरान की प्रतिक्रिया से साफ है कि वह इस नए सुरक्षा समीकरण को गंभीरता से देख रहा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों में पिछले कुछ समय में संवाद और तनाव दोनों देखने को मिले हैं। ऐसे में सऊदी अरब का तुर्किए और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह समझौता केवल राजनीतिक घोषणा तक सीमित रहता है या आने वाले समय में तीनों देशों के बीच वास्तविक सैन्य और सुरक्षा सहयोग को भी नई दिशा देता है।

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