नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर (Dr. S. Jaishankar) ने 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के इतर आयोजित बहुपक्षवाद शिखर सम्मेलन (Multilateralism Summit) में वैश्विक व्यवस्था पर बढ़ते दबाव के बीच बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने सम्मेलन में सह-प्रायोजक के रूप में संयुक्त राष्ट्र में सुधार और बहुपक्षवाद को मजबूत करने की वकालत की। सम्मेलन की सह-मेजबानी यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, ब्राजील, कनाडा, भारत और केन्या के साथ की।
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों, संस्कृतियों और इतिहास से आने के बावजूद सभी देश समान वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। दुनिया एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहां संघर्ष लगातार फैल रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून का बार-बार उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय प्रणाली भारी तनाव में है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक असुरक्षा जैसी चुनौतियां इतनी व्यापक हैं कि कोई भी देश अकेले उनका सामना नहीं कर सकता।
कोस्टा ने टकराव को सहयोग में बदलने की जरूरत बताते हुए बहुपक्षीय सहयोग, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित वैश्विक नेटवर्क बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बहुपक्षवाद के साझेदारों की यह पहल एक खुला मंच है, जिसमें दुनिया के सभी हिस्सों के वे साझेदार शामिल हो सकते हैं जो साझा सिद्धांतों की रक्षा के लिए तैयार हैं। इसका उद्देश्य संवाद, गठबंधन निर्माण और व्यावहारिक सहयोग के जरिए ठोस समाधान तलाशना तथा संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय प्रारूपों के काम का समर्थन करना है।
वैश्विक व्यवस्था तनाव में : जयशंकर
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने पहल शुरू करने के लिए एंटोनियो कोस्टा को धन्यवाद देते हुए कहा कि भारत सह-प्रायोजक के रूप में इसमें शामिल होकर प्रसन्न है। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय ऐसी स्थिति में है, जब वैश्विक व्यवस्था तनाव में है। पिछले कुछ दशकों से दुनिया में एक स्थिर पुनर्संतुलन देखा जा रहा था, जो लंबे समय से अपेक्षित संरचनात्मक विकास था। हालांकि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और वास्तविक संघर्षों ने इसे अलग स्वरूप दे दिया है।
जयशंकर ने कहा कि यदि इस स्थिति को अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना पर ही सवाल खड़े करेगी। इसलिए इस मोड़ पर बहुपक्षवाद की आवाज को मजबूती से उठाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि दांव पर केवल शब्द या अभिव्यक्तियां नहीं हैं, बल्कि शांति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई और जलवायु न्याय, उभरती प्रौद्योगिकियां, विकास वित्त, आतंकवाद से मुकाबला, आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना, आपदा लचीलापन और महामारी की तैयारी जैसे वास्तविक मुद्दे हैं।
तीन प्रमुख प्राथमिकताएं
एंटोनियो कोस्टा ने वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं बताईं। पहली प्राथमिकता उन नियमों और संस्थाओं की रक्षा करना है, जो सभी की सुरक्षा करते हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और अंतरराष्ट्रीय कानून शामिल हैं।
दूसरी प्राथमिकता जलवायु वित्त, सतत विकास, महामारी की तैयारी, आर्थिक लचीलापन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रगति करना है। तीसरी प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार करना है, ताकि वे भविष्य की दुनिया की जरूरतों के अनुरूप बन सकें। कोस्टा ने भविष्य के लिए समझौता, संयुक्त राष्ट्र 80 पहल और अन्य सुधारों का उल्लेख करते हुए इन्हें संयुक्त राष्ट्र को अधिक सुसंगत, प्रभावी और कुशल बनाने का महत्वपूर्ण अवसर बताया।
जयशंकर ने कहा कि अब तक जो कुछ हासिल हुआ है, वह सामूहिक प्रयासों से ही संभव हुआ है। इसलिए बेहतर के लिए प्रयास करते हुए अच्छे की रक्षा करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज का कार्य उन चीजों को मजबूत करना है जो देशों को जोड़ती हैं, विश्वास का निर्माण करना है, संवाद को गहरा करना है और ऐसा नेटवर्क तैयार करना है जो देशों को एक-दूसरे के करीब ला सके।
भारत ने 4एफ संकट और जोखिम कम करने पर दिया जोर
जयशंकर ने भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि चल रहे संघर्षों के संबंध में व्यापक शांति के लिए प्रयास करने के साथ-साथ विशिष्ट आयामों को भी संबोधित किया जा सकता है। उन्होंने ईंधन, भोजन, उर्वरक और वित्त के 4एफ संकट को अपने आप नहीं छोड़ने पर जोर दिया। उनके अनुसार यह संकट वैश्विक स्तर पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है।
उन्होंने कहा कि जब नई क्षमताएं और चिंताएं सामने आती हैं तो उनके लिए मजबूत ढांचे और सुरक्षा उपायों की जरूरत होती है। जहां बाधाओं, प्रभुत्व और व्यवधान का खतरा हो, वहां जोखिम कम करने और विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जयशंकर ने यह भी कहा कि जहां बाध्यकारी कारण या मजबूत आधार हो, वहां समान विचारधारा वाले देशों को साथ आने का आत्मविश्वास होना चाहिए। सामूहिक कार्रवाई के लिए यह महत्वपूर्ण है।
सुधारित बहुपक्षवाद पर जोर
जयशंकर ने कहा कि बहुपक्षवाद तब सबसे प्रभावी ढंग से काम करेगा, जब अंतरराष्ट्रीय कानून, नियमों और मानदंडों का ईमानदारी से पालन किया जाएगा। बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाने के लिए उसके समर्थन के साथ-साथ उसके व्यावहारिक इस्तेमाल को भी मजबूत करना होगा।
उन्होंने सुधारित बहुपक्षवाद को आवश्यक बताते हुए कहा कि अधिक सहभागी विचार-विमर्श और पारदर्शी निर्णय-निर्माण की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। इससे संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को आवश्यक आशा और आशावाद मिलेगा तथा देशों के साथ मिलकर काम करने के संकल्प को मजबूती मिलेगी। उन्होंने सभी देशों से साझा लक्ष्यों के लिए एक साथ आने और बहुपक्षवाद को केवल अवधारणा नहीं, बल्कि प्रभावी कार्यप्रणाली के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
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