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सिर्फ एक थप्पड़ क्रूरता नहीं- हाईकोर्ट से पति को मिली राहत

February 22, 2026

डेस्क: गुजरात हाईकोर्ट ने एक खास फैसले सुनाते हुए कहा कि मायके में रात रुकने पर पत्नी को सिर्फ एक बार थप्पड़ मारना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता है. कोर्ट ने ये कहते हुए पति को पत्नी की आत्महत्या के लिए उकसाने और वैवाहिक क्रूरता के मामले में बरी कर दिया. इस मामले में निचली अदालत ने पति को एक साल की सजा सुनाई थी.

यह पूरा मामला 1996 का है. शादी के एक साल बाद एक महिला ने आत्महत्या कर ली थी. महिला के परिजनों ने पति पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने का आरोप लगाया था. पुलिस ने केस दर्ज करके पति को गिरफ्तार कर लिया. 2003 में वलसाड की निचली अदालत ने पति को दोषी ठहराते हुए सात साल कैद की सजा सुनाई थी.


  • हाईकोर्ट की जस्टिस गीता गोपी ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि सबूतों में कई कमियां हैं. अभियोजन पक्ष का मुख्य आरोप था कि पति ने एक बार पत्नी को उसके मायके में थप्पड़ मारा था, क्योंकि वह बिना बताए वहां रुक गई थी. इसके अलावा पति बारातों में बैंड बजाने का काम करता था और रात में देर से घर लौटता था, जिससे उनके बीच झगड़े होते थे.

    अदालत ने कहा कि सिर्फ एक बार थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं माना जा सकता. महिला के माता-पिता के बयानों में भी विरोधाभास था. मां ने थप्पड़ मारने की बात कही, लेकिन पिता ने माना कि उन्होंने यह घटना नहीं देखी. सबसे अहम बात यह है कि शादी के दौरान महिला ने कभी भी पति के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी.

    जस्टिस गोपी ने अपने आदेश में लिखा, “पत्नी को थप्पड़ मारने की एक घटना को क्रूरता नहीं कहा जा सकता. यह साबित नहीं हो पाया कि यही वजह आत्महत्या के लिए जिम्मेदार थी.” कोर्ट ने यह भी कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में यह साबित करना जरूरी है कि लगातार ऐसी क्रूरता की गई हो, जिसे सहन करना मुश्किल हो. सिर्फ रोजमर्रा के वैवाहिक झगड़ों को अपराध नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए पति को बरी कर दिया है.

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