
दरभंगा । दरभंगा की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से (Last Queen of Darbhanga Kamsundari Devi’s death) पूरे मिथिलांचल में शोक की लहर फैल गई (Has sent Shockwave in whole Mithilanchal) । वे पिछले छह महीनों से अस्वस्थ चल रही थीं और सोमवार को दरभंगा स्थित महाराज कामेश्वर सिंह के कल्याणी निवास में उनका निधन हो गया।
राजपरिवार के सदस्य और बड़ी संख्या में गणमान्य लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गए हैं और महारानी के निधन पर शोक व्यक्त कर रहे हैं। महारानी कामसुंदरी के सबसे बड़े पोते रत्नेश्वर सिंह ने बताया कि सोमवार सुबह लगभग 3 बजे महारानी ने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार माधेश्वर प्रांगण में होगा। रत्नेश्वर ने कहा, “यह हम सबके लिए बहुत दुखद समय है। परिवार के सदस्य एकत्र हो रहे हैं। राजेश्वर सिंह अभी अमेरिका में हैं, जबकि कपिलेश्वर सिंह जल्द आ रहे हैं।”
वहीं, बिहार सरकार में कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने शोक व्यक्त करते हुए अपने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “दरभंगा राज परिवार की अंतिम महारानी, महारानी कामसुंदरी देवी जी के निधन से पूरा बिहार शोक में डूबा है। उनका जीवन त्याग, सेवा और देशभक्ति की एक प्रेरणादायक मिसाल रहा। भारत–चीन युद्ध के समय देश के लिए 600 किलो सोना दान कर उन्होंने राष्ट्रसेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था।” उन्होंने आगे लिखा, “महारानी कामसुंदरी देवी जी का जाना न केवल दरभंगा बल्कि पूरे बिहार और देश के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर पुण्यात्मा को अपने चरणों में स्थान दें और शोकसंतप्त परिवार को इस कठिन समय में धैर्य एवं संबल प्रदान करें।”
गौरतलब है कि महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 1930 में हुआ था और उन्होंने 1940 में महाराज कामेश्वर सिंह से विवाह किया था। इससे पहले महाराज ने अपनी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया से विवाह किया था। महाराज कामेश्वर सिंह दरभंगा के अंतिम शासक थे, जिनका निधन 1962 में हुआ। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी का निधन 1976 में हुआ, जबकि दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में हो गया था।
महाराज के निधन के बाद महारानी कामसुंदरी देवी ने उनकी स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी। इस फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने दरभंगा में पुस्तकालय का निर्माण कराया, जिसमें आज भी लगभग 15 हजार पुस्तकें सुरक्षित हैं। फाउंडेशन के जरिए उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया और मिथिला क्षेत्र में शिक्षा और संस्कृति को प्रोत्साहित किया, वहीं अब महारानी कामसुंदरी देवी का निधन न सिर्फ राजपरिवार के लिए, बल्कि पूरे मिथिला क्षेत्र के लिए एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनके योगदान और समाजसेवा की याद लंबे समय तक जीवित रहेगी। शाही परिवार और स्थानीय लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
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