
भोपाल। मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता को लेकर सियासी टकराव और तेज हो गया है। विधानसभा में यूसीसी विधेयक पारित होने के बाद अब नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इसे लेकर बड़ा बयान दिया है। भोपाल में विधायक आरिफ मसूद की ओर से आयोजित जंगे आजादी-उलेमा की कुर्बानी कार्यक्रम में भाषण के दौरान सिंघार ने कहा कि 2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो यूसीसी के इस कानून को खत्म कर दिया जाएगा। उन्होंने इसे काला कानून बताते हुए इसे वापस लेने की बात कही। सिंघार के इस बयान के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में यूसीसी एक बार फिर बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में सामने आ गया है।
मध्यप्रदेश सरकार ने 20 जुलाई को विशेष मंत्रिमंडल बैठक में समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 को मंजूरी दी थी। इसके अगले दिन 21 जुलाई को विधानसभा में विधेयक पारित कर दिया गया। विपक्षी कांग्रेस विधायकों ने विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की थी और विरोध में सदन के अंदर हंगामा भी हुआ था। विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में बहुविवाह पर रोक, विवाह का अनिवार्य पंजीयन और साथ रह रहे जोड़ों के संबंधों का पंजीयन शामिल हैं। अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखने का प्रावधान भी किया गया है।
समान नागरिक संहिता का मतलब ऐसे समान नागरिक कानून से है, जिसमें धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, गोद लेने और कुछ अन्य पारिवारिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था लागू हो। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है। हालांकि यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है।
कांग्रेस समेत अन्य विपक्ष पार्टियों की ओर से यूसीसी को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। विरोध का एक प्रमुख मुद्दा यह है कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और पारंपरिक व्यवस्थाओं पर समान कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा। आदिवासी समाज की परंपराओं और संवैधानिक संरक्षण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। वहीं सरकार का तर्क है कि समान कानून से नागरिकों को बराबरी का अधिकार मिलेगा और महिलाओं को विवाह, तलाक तथा संपत्ति जैसे मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी यूसीसी को समानता और सामाजिक समरसता से जोड़ते हुए इसके समर्थन में बात कही है।
मध्यप्रदेश में यूसीसी विधेयक विधानसभा से पारित होने के बाद नेता प्रतिपक्ष का यह बयान सीधे तौर पर सरकार के फैसले को चुनौती माना जा रहा है। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले यूसीसी का मुद्दा भाजपा और कांग्रेस के बीच बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
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