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मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज की बच्चों के प्रति जागृत संवेदना

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

कोरोना की दूसरी लहर कई परिवारों पर जैसे वज्रपात बनकर टूटी है, कितनों ने अपनों को खोया और न जाने कितने नौनिहाल हैं जिनके ऊपर से माता-पिता या दोनों में से किसी एक का साया छिन गया। किंतु लोककल्याणकारी राज्य की भूमिका में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी के दर्द को महसूस कर उनके दुखों को कम करने जैसे आगे आए हैं। वह उन तमाम लोगों के लिए मिसाल अवश्य हैं जो राजनीतिक जीवन में पद पर होने के बाद भी उस पद का लाभ गरीब, वंचितों और जरूरतमंद को नहीं दे पाते हैं। निश्चित ही मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने ”कोविड-19 बाल सेवा योजना” के माध्यम से मासिक आर्थिक सहायता में प्रत्येक बाल हितग्राही को पांच हजार रुपए प्रतिमाह की सहायता राशि बैक खाते में जमा करने का जो प्रयास शुरू किया है, वह देशभर में अभिनव प्रयास है।

वस्तुत: योजना में कहा गया है कि यदि बच्चे की आयु 18 वर्ष से कम है तो बच्चों की सहायता राशि चिन्हांकित संरक्षक के संयुक्त खाते में जमा की जायेगी। 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने के उपरांत उसके व्यक्तिगत खाते में जमा की जायेगी। सहायता राशि संबंधित बाल हितग्राही को 21 वर्ष की आयु तक देय होगी। इसके साथ ही प्रत्येक बाल हितग्राही और योजना के प्रावधानों के अंतर्गत नियुक्त उनके संरक्षक को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत मासिक राशन प्रदाय की जा रही है। इतना ही नहीं तो प्रत्येक बाल हितग्राही को स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, मेडिकल शिक्षा, विधि शिक्षा आदि के लिए नि:शुल्क शिक्षा (पहली कक्षा से स्नातक तक) उपलब्ध करवाई जा रही है। जिसमें महिला बाल विकास को इस योजना में अबतक 672 आवेदन मिल चुके हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं ”जीवित समाज के रहते कोई कैसे अनाथ हो सकता है, यह मैं ऐसे ही नहीं कह रहा दुनिया में अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता को बचपन में ही खो दिया था परंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे आगे बढ़ें और इतने आगे बढ़ें कि समाज के पथ प्रदर्शक बनें। गोस्वामी तुलसीदास, विवेकानंद, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन आदि गुरू शंकराचार्य, मिल्खा सिंह, नेल्सन मंडेला, स्टीव जाव्स सहित अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में दुनिया को दिशा दिखाई है।”

इसी प्रकार से मुख्यमंत्री शिवराज जब समझाते हैं कि कोविड -19 से अनेक परिवारों में आजीविका उपार्जन करने वाले माता/पिता की आकस्मिक मृत्यु हुई है, ऐसे प्रभावित परिवारों के बच्चो को शासकीय सहायता दिये जाने की आवश्यकता है। इस योजना का उद्देश्य इन बच्चों को आर्थिक एवं खाद्य सुरक्षा प्रदान करना है , ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन निर्वाह करते हुए अपनी शिक्षा भी निर्विघ्न रूप से पूरी कर सके, तब उनके अंदर के भाव को बहुत गहरे से समझा जा सकता है।

पिछली बार जब ऐसे सभी बच्चों के खाते में ‘शिवराज जी’ ने रुपए जमा करवाए थे, तब भी उन्होंने कहा था कि मुझे पीड़ा है लेकिन मेरे बच्चों तुम चिंता मत करना, हरसंभव अच्छी परवरिश, पढ़ाई-लिखाई हर चीज की व्यवस्था की जा रही है। एमबीबीएस से लेकर तमाम डिग्री सरकार कराएगी और पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाएगी। इसी के साथ पहली बार में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा कोरोना से अनाथ हुए 173 बच्चों के खाते में 8 लाख 63 हजार रुपए ट्रांसफर किए गए थे तो अब फिर से कोविड-19 बाल सेवा योजना में सिंगल क्लिक से 16 लाख 40 हजार रुपये की राशि 328 बाल हितग्राहियों के खाते में डाली गई है।

वस्तुत: इसबार फिर उन्होंने दोहराया है कि ”योजना के हितग्राहियों को 5 हजार रुपये प्रतिमाह, भोजन के लिए राशन की व्यवस्था, शिक्षा के लिए भारत में कहीं भी शिक्षा का वहन राज्य सरकार करेगी। बच्चों चिन्ता न करो आपका मामा आपके साथ है”- इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अपने माता-पिता खो चुके ऐसे सभी बच्चों को आश्वस्त किया है कि यदि अन्य कोई आवश्यकता होगी तो कलेक्टर्स उनकी देखभाल करेंगे। बच्चों की देखभाल के लिए हर जिले में एक पालक अधिकारी नियुक्त किया जा रहा है।

सरकार आज ऐसे प्रकरणों को भी प्रमुखता से संज्ञान में ले रही है, जिसमें कि माता-पिता के नहीं रहने पर उनके परिवारजन बहुत कम कीमत पर उनकी सम्पत्ति को बेच दे रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज ने सभी कलेक्टर्स को निर्देशित किया हुआ है कि ऐसे प्रकरणों के सामने आने पर तुरंत कार्रवाई कर हितग्राहियों की सम्पत्ति को सुरक्षित एवं संरक्षित करें। माता-पिता की संपत्ति उनके बच्चों के नाम ही हो, यह सुनिश्चित करें।

इस संदर्भ में व्यापक तौर पर देखें तो अब तक ऐसे कई उदाहरण सामने आ चुके हैं, जिसमें कि बच्चों की अपनी अलग-अलग समस्याएं हैं । सरकार का प्रयास यही है कि वह सभी का समाधान उनके हित में बेहतर तरीके से कर पाए। आज इसके लिए जरूर मुख्यमंत्री का धन्यवाद बनता है कि उन्होंने अबतक स्पॉन्सरशिप योजना के अंतर्गत 223 हितग्राहियों को दो हजार रुपये प्रतिमाह प्रति हितग्राही के रूप में 4 लाख 46 हजार रुपये की राशि अंतरित कर दी है। बालक-बालिकाओं को फोस्टर केयर में भेजने का क्रम निरन्तर बनाए रखा है। बालिकाओं को शिक्षा के साथ पढ़ाई और व्यवसायिक प्रशिक्षण कराया जा रहा है।

मुख्यमंत्री के तौर पर एकतरफ शिवराज सभी की बराबर से चिंता कर रहे हैं, तो दूसरी ओर वे बच्चों के लिए सही अर्थों में उनके प्रिय ”मामा” बनकर सामने आए हैं। जब स्वयं शिवराज सिंह चौहान यह कहते हैं कि ‘मैं सच कहूं तो मुख्यमंत्री के नाते मैंने कम काम किया है, मैंने साढ़े सात करोड़ जनता को परिवार मानकर काम किया है। यह मैं झूठ नहीं बिल्कुल सच बोल रहा हूं। मैं साढ़ सात करोड़ जनता को अपने परिवार का ही सदस्य मानकर चलता हूं, उनका सुख-दुख सब मेरे हैं। इसलिए जब हमने योजनाएं बनाई, जनता के दर्द को हमने समझा। गरीब के दुख मैं जानता हूं। उनकी कही इस बात में सच्चाई नजर आती है।

वे यह भी सहज स्वीकारते हैं कि जब मुख्यमंत्री का ओहदा मिला तब उन्होंने ”लाडली लक्ष्मी योजना” बनाई। हर कदम पर बेटी के जन्म लेने से लेकर उसके अंतिम सांस तक सरकार उसके साथ खड़ी कर दी। इसके बाद बेटियों के मन में एक भाव बनता चला गया कि हमारा मुख्यमंत्री हमारे बारे में सोचता है इसलिए उन्होंने मुझे मामा कहना शुरू कर दिया। ‘बेटियों ने पहले मामा कहा तो फिर बेटे भी शुरू हो गए मुझे मामा कहना। बेटियों को साइकिल दी तो उन्हें भी साइकिल चाहिए थी तो फिर बेटों को भी साइकिल दी। आज हर बच्चा वहां चिल्ला-चिल्लाकर मुझे मामा ही पुकारा करता है। मेरा मध्य प्रदेश के लोगों और बच्चों से एक अलग तरह का रिश्ता बना हुआ है। मुझे गर्व है कि मुझे मेरी जनता का प्यार और विश्वास हासिल है। यह रिश्ता दिल से बना है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।’ वस्तुत: मुख्यमंत्री की इन्हीं बातों में उनकी संवेदनशीलता छिपी हुई है। काश यह दर्द और संवेदना का स्तर हर राजनेता एवं लोकसेवक में आ जाए।

(लेखक, फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)

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