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MP: भागीरथपुरा के जहरीले पानी की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक, सिस्टम की लापरवाही का खुलासा! जांच आयोग ने एक नहीं, जिम्मेदारी की पूरी कड़ी बताई

September 30, 2026

भागीरथपुरा में दूषित पानी से बीमारी और मौतों के मामले में हाईकोर्ट के समक्ष पेश की गई वन-मैन इंक्वायरी कमीशन की फाइनल रिपोर्ट सामने आने के बाद पानी की सप्लाई व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले को किसी एक अधिकारी की गलती नहीं माना, बल्कि जलापूर्ति और सीवरेज व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही तकनीकी, प्रशासनिक और निगरानी संबंधी खामियों की एक पूरी कड़ी बताई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भागीरथपुरा में पानी की पाइपलाइन और सीवरेज लाइन कई स्थानों पर एक-दूसरे के बेहद करीब थीं और कुछ स्थानों पर उनके क्रॉसिंग तथा ओवरलैपिंग की स्थिति सामने आई। आयोग के मुताबिक यह स्थिति सीवरेज के दूषित पानी के पेयजल नेटवर्क में पहुंचने का गंभीर जोखिम पैदा करती थी। पानी के नमूनों में फीकल कॉलीफॉर्म और E. coli मिलने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है।

‘एक गलती’ नहीं, सालों की लापरवाही का नतीजा

रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यह है कि भागीरथपुरा की घटना को किसी एक अधिकारी की अचानक हुई लापरवाही से जोड़ना पर्याप्त नहीं है। आयोग ने कहा कि यह मामला कई स्तरों पर सिस्टम की विफलता से जुड़ा है। पुरानी और कमजोर पाइपलाइन, पर्याप्त निगरानी का अभाव, समय पर रखरखाव और रिप्लेसमेंट नहीं होना, संक्रमण के खतरे की पहचान में कमी और कार्रवाई में देरी।

आयोग ने नगर निगम को सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था के लिए प्राथमिक जिम्मेदार संस्था माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पानी की सप्लाई की निगरानी, रखरखाव, लीकेज की पहचान और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई जैसी जिम्मेदारियों में कमियां सामने आईं।

इंजीनियरों की भूमिका पर सबसे गंभीर सवाल

रिपोर्ट के एक हिस्से में फील्ड लेवल अधिकारियों को सीधे तकनीकी जिम्मेदारी से जोड़ा गया है। इसमें Assistant Engineer, Sub-Engineer और Site Supervisor की भूमिका का उल्लेख है। पाइपलाइन की गलत लेआउट, तकनीकी मानकों के पालन में कमी और निगरानी में लापरवाही को जिम्मेदारी तय करने के प्रमुख आधारों में रखा गया है।

रिपोर्ट में संजय/संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका का भी विस्तार से उल्लेख है। आयोग के अनुसार वे लंबे समय तक वाटर सप्लाई विभाग में पदस्थ रहे और उनसे पाइपलाइन के निरीक्षण, रखरखाव, लीकेज की पहचान, जोखिम वाले हिस्सों की निगरानी और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई की अपेक्षा थी। आयोग ने उनकी भूमिका को विशेष रूप से जांचा है।

प्रभारी सहायक अभियंता से भी पूछे गए सवाल

रिपोर्ट में तत्कालीन प्रभारी सहायक अभियंता सरोज कुमार प्रजापति का बयान भी दर्ज है। रिपोर्ट के मुताबिक उनके कार्यकाल में पाइपलाइन लीकेज, अनधिकृत कनेक्शन और ड्रेनेज लाइन की नजदीकी जैसी परिस्थितियों की जानकारी सामने आई। आयोग ने यह भी दर्ज किया कि पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें मिलने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई का सवाल बना रहा।

टेंडर में भी महीनों की देरी

मामला सिर्फ पुरानी पाइपलाइन तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्ट में पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया के टेंडर में हुई देरी का भी बड़ा हिस्सा है। एक टेंडर प्रक्रिया में करीब 859 दिन से ज्यादा की कुल असामान्य देरी का उल्लेख किया गया है। आयोग ने तकनीकी शाखा, टेंडर शाखा, कार्यपालन यंत्री, टेंडर कमेटी और फाइल लंबित रखने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच की।

रिपोर्ट में Executive Engineer संजीव कुमार श्रीवास्तव को टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी और वित्तीय प्रोसेसिंग, ठेकेदार पर समय पर कार्रवाई और काम की निगरानी से जुड़ी जिम्मेदारियों के संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है। ठेकेदार Malwa Engineering, Indore पर भी एग्रीमेंट और काम पूरा करने में देरी का उल्लेख है।

हाईकोर्ट की जांच रिपोर्ट का बड़ा निष्कर्ष

रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में आयोग ने साफ कहा है कि भागीरथपुरा की दूषित जल आपूर्ति की घटना किसी एक अधिकारी की गलती का परिणाम नहीं थी। आयोग ने इसे अलग-अलग समय पर अलग-अलग अधिकारियों और संस्थागत स्तर पर हुई चूकों का परिणाम बताया है।

रिपोर्ट में 1990-95 के दौरान सीवरेज लाइन और 1999-2004 के दौरान जलापूर्ति पाइपलाइन के निर्माण से लेकर बाद के रखरखाव और निगरानी तक की जिम्मेदारियों को जांच के दायरे में रखा गया है। साथ ही संजीव कुमार श्रीवास्तव की लंबे समय तक वाटर सप्लाई विभाग में पदस्थापना और पाइपलाइन की निगरानी में उनकी भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं।

यानी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है- भगिरथपुरा में पानी दूषित होने के पीछे सिर्फ पाइपलाइन में खराबी नहीं, बल्कि योजना से लेकर निर्माण, निगरानी, रखरखाव, शिकायतों पर कार्रवाई और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया तक कई स्तरों की चूक सामने आई है।

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