
नई दिल्ली :नेपाल (Nepal) में हुए ऐतिहासिक (Historic) आम चुनाव 2026 की मतगणना जारी है और शुरुआती रुझानों ने देश की राजनीति (Politics) में बड़ा बदलाव आने के संकेत दे दिए हैं। ताजा रुझानों के मुताबिक काठमांडू के पूर्व मेयर और युवा नेता बलेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी आरएसपी (RSP) जबरदस्त बढ़त के साथ आगे बढ़ रही है। कई सीटों पर पार्टी की बढ़त ने नेपाल की पारंपरिक(Nepal’s traditional) राजनीतिक पार्टियों (political parties)खासकर वामपंथी दलों के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव के लिए देशभर में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ था। नेपाल के चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। पूरे देश में 10963 मतदान केंद्र बनाए गए थे जहां करीब 1.89 करोड़ पात्र मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। मतदान के तुरंत बाद मतगणना शुरू कर दी गई और आयोग का लक्ष्य 9 मार्च तक पूरी प्रक्रिया समाप्त करने का है।
शुरुआती रुझानों के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी शानदार प्रदर्शन करती नजर आ रही है। पार्टी अब तक कई सीटों पर आगे चल रही है और कुछ सीटों पर जीत भी हासिल कर चुकी है। काठमांडू के कई निर्वाचन क्षेत्रों में आरएसपी उम्मीदवारों की बढ़त ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। काठमांडू 1 काठमांडू 7 और काठमांडू 8 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों ने मजबूत प्रदर्शन किया है। काठमांडू 1 सीट से आरएसपी उम्मीदवार रंजू दर्शन ने भारी अंतर से जीत दर्ज की है। बताया जा रहा है कि उन्हें 10000 से अधिक वोट मिले जो उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी से लगभग दोगुने हैं।
इस चुनाव का सबसे चर्चित मुकाबला झापा 5 सीट पर देखा जा रहा है। यहां बलेन शाह का मुकाबला नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और सीपीएन यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली से है। शुरुआती मतगणना में बलेन शाह ने बड़ी बढ़त बना ली है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक शाह को करीब 1478 वोट मिले जबकि ओली को करीब 384 वोट ही मिल पाए। यह सीट इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि ओली यहां से कई बार चुनाव जीत चुके हैं और इसे उनका मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत दे रहा है। पिछले साल सितंबर 2025 में हुए जेन जेड आंदोलन के बाद यह पहला आम चुनाव है। उस समय भ्रष्टाचार बेरोजगारी और खराब प्रशासन के खिलाफ युवाओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था। उसी आंदोलन के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा था और संसद भंग कर दी गई थी।
युवाओं की इसी नाराजगी और बदलाव की मांग का असर अब चुनाव परिणामों में भी दिखाई दे रहा है। लगभग दस लाख नए युवा मतदाताओं ने इस चुनाव में पहली बार वोट डाला और शुरुआती रुझानों से संकेत मिल रहे हैं कि इन मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर बदलाव के पक्ष में मतदान किया है।
नेपाल की संसद प्रतिनिधि सभा में कुल 275 सदस्य होते हैं। इनमें से 165 सदस्य सीधे चुनाव यानी फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली से चुने जाते हैं जबकि 110 सीटों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत उम्मीदवार चुने जाते हैं। इस बार सीधे चुनाव वाली सीटों पर करीब 3400 उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि आनुपातिक प्रणाली के तहत 3135 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
वहीं नेपाली कांग्रेस और अन्य वामपंथी दल भी चुनाव मैदान में हैं लेकिन शुरुआती रुझानों में वे आरएसपी की लहर के सामने कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर यही रुझान आगे भी जारी रहते हैं तो नेपाल की राजनीति में एक नई पीढ़ी के नेतृत्व का उदय हो सकता है और देश में सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
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