
डेस्क: भले ही कच्चे तेल का संकट थोड़ा कम हो गया हो गया हो और कीमतों में कमी के कारण महंगाई दबाव कम हुआ हो, लेकिन भारत की इकोनॉमी के लिए नया सिरदर्द खड़ा हो गया है. वास्ताव में कमजोर मानसून भारत के लिए महंगाई का अगला खतरा बनकर उभर रहा है. अल-नीनो (El Niño) के कारण बारिश कम होने और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का डर है, जबकि तेल की कीमतों में नरमी से महंगाई का दबाव कुछ कम हुआ है. दक्षिण-पश्चिम मानसून, जिससे भारत में सालाना बारिश का लगभग 70 फीसदी हिस्सा आता है, 300 अरब डॉलर की एग्रीकल्चर इकोनॉमी के लिए बहुत जरूरी है. इसका खाने-पीने की चीजों की कीमतों, ग्रामीण मांग और कुल आर्थिक उत्पादन पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है.
एलएंडटी फाइनेंस लिमिटेड की इकोमिस्ट की रिपोर्ट में कहा कि खराब बारिश से इक्विटी मार्केट और ग्रामीण खर्च, दोनों पर बुरा असर पड़ता है. एलएंडटी फाइनेंस 450 अरब रुपए (4.8 अरब डॉलर) से ज्यादा का ग्रामीण लोन का कारोबार करती है. उन्होंने कहा कि पहले महंगाई बढ़ती है, फिर लोगों का मूड खराब होता है, जिससे त्योहारों के मौसम में खर्च कम हो जाता है. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अधिकारियों ने कहा है कि वे महंगाई के हालात का अंदाजा लगाने के लिए मौसम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और अगर कीमतों का दबाव बढ़ता है तो वे कदम उठाने के लिए तैयार हैं. RBI ने इस महीने अपनी मुख्य ब्याज दर को 5.25 फीसदी पर बनाए रखा और महंगाई के अपने 2-6 फीसदी के लक्ष्य के दायरे में रहने के कारण न्यूट्रल रुख अपनाया.
क्वांटइको रिसर्च की इकोनॉमिस्ट अर्थशास्त्री युविका सिंघल की रिसर्च के अनुसार, बारिश में 10 फीसदी की कमी से खाने-पीने की चीजों की कीमतों के कारण होने वाली मुख्य कंज्यूमर महंगाई (हेडलाइन कंज्यूमर इन्फ्लेशन) में एक प्रतिशत अंक तक की बढ़ोतरी हो सकती है. 22 जून तक भारत में कुल बारिश सामान्य से 43 फीसदी कम थी. ग्रामीण भारत में, मानसून में देरी — जो आम तौर पर 1 जून से 30 सितंबर तक चलता है — का असर सरकारी आंकड़ों में सबसे पहले नहीं दिखता. इसके बजाय, इसका असर खाद की कम खरीद, ट्रैक्टर की बुकिंग टालने, मोटरसाइकिल के बारे में कम पूछताछ और सितंबर में शुरू होने वाले त्योहारों के मौसम से पहले दुकानदारों द्वारा स्टॉक कम रखने के रूप में दिखता है.
फिर यह कमजोरी गांवों से बाहर फैलती है और कुल खपत और ग्रोक पर असर डालती है. एक राहत की बात भारत के पास अनाज का भरपूर स्टॉक होना है. इस हफ्ते एक इंटरव्यू में, RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी के बाहरी सदस्य नागेश कुमार ने इस साल कम बारिश को लेकर चिंता कम करने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि समय के साथ खेती मौसम पर कम निर्भर हो गई है और अनाज का भरपूर स्टॉक कमी के समय सुरक्षा देता है. बुधवार को, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी भारत के स्टॉक को एक संभावित सुरक्षा कवच के तौर पर बताया. हालांकि, अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं कि स्टॉक मौसम की वजह से उत्पादन पर पड़ने वाले लंबे समय के असर की भरपाई सिर्फ कुछ हद तक ही कर सकते हैं.
बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट ने कहा कि वह बफर स्टॉक चावल और गेहूं के लिए है, न कि दालों, तिलहन और मोटे अनाज के लिए है. उन्होंने कहा कि अल नीनो न सिर्फ भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है. हमें सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. हम दक्षिण-पूर्व एशिया से खाने का तेल इंपोर्ट करते हैं. बारिश की कमी का असर उन पर भी पड़ेगा. मानसून में देरी से इसके सितंबर के आखिर और अक्टूबर तक खिंचने का भी खतरा है, जिससे कटाई में रुकावट आ सकती है और फसलों को नुकसान हो सकता है. सबनवीस को उम्मीद है कि खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों के कारण अक्टूबर तक हेडलाइन महंगाई दर 5.5 फीसदी तक पहुंच सकती है, जो सेंट्रल बैंक के टारगेट बैंड की ऊपरी सीमा के करीब है. ऐसी स्थिति में RBI ब्याज दरें बढ़ा सकता है, जो फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी होगी.
सरकार कम बारिश वाले 315 जिलों की पहचान करके इस असर को कम करने की कोशिश कर रही है, जिनमें सिंचाई की सीमित सुविधा वाले 111 हाई-प्रायोरिटी इलाके भी शामिल हैं. इमरजेंसी प्लान प्रमुख कृषि राज्यों में फसल चुनने, पानी के इस्तेमाल और इमरजेंसी उपायों के बारे में गाइडेंस देंगे. अगर सूखा जारी रहता है, तो फसल उत्पादन और ग्रामीण आय की सुरक्षा के लिए सरकार राज्यों के साथ तालमेल भी बढ़ा रही है. 2023 में, मानसून में देरी और कम बारिश के कारण नई दिल्ली ने घरेलू कीमतों को काबू में रखने के लिए चावल के एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी थी, जिससे उस बाजार पर असर पड़ा जो ग्लोबल चावल शिपमेंट के लिए लगभग 40 फीसदी तक भारत पर निर्भर है. इस साल अब तक ऐसी किसी पाबंदी के संकेत नहीं मिले हैं.
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