
– डॉ. निवेदिता शर्मा
जब जीवन मातृभूमि, स्वाभिमान और कर्तव्य के लिए समर्पित हो जाता है, तब मृत्यु इतिहास का अमर अध्याय बन जाती है। 24 जून 1564 को नर्रई की रणभूमि में रानी दुर्गावती का प्राणोत्सर्ग इसी अमर परंपरा का वह शिखर है, जहाँ एक स्त्री शासक ने अपने राज्य, स्वाभिमान और स्वतंत्र अस्तित्व की रक्षा के लिए मुगल साम्राज्य की विशाल सैन्य शक्ति के सामने अदम्य साहस के साथ मोर्चा लिया। उनका जीवन बताता है कि कर्मयोग का वास्तविक अर्थ सत्ता का उपभोग नहीं, कर्तव्य के लिए स्वयं को अर्पित करना है।
जन्म जीवन का प्रथम सत्य है और मृत्यु उसका अंतिम सत्य। इन दोनों के मध्य मनुष्य अपने कर्मों से अपने जीवन का अर्थ निर्धारित करता है। इतिहास में असंख्य शासक आए और चले गए। कुछ के नाम समय की धूल में खो गए, जबकि कुछ व्यक्तित्व मृत्यु के पश्चात और अधिक विराट होते गए। रानी दुर्गावती इसी दूसरी श्रेणी की शासक थीं। उनके लिए प्रजा की सुरक्षा और स्वतंत्रता ही सर्वप्रथम रही। यही कारण है कि उनका बलिदान भारतीय इतिहास में वीरता, स्वाभिमान और नारी शक्ति का कालजयी प्रतीक बन गया।
उनका विवाह गढ़ा-कटंगा के शासक दलपतशाह से हुआ। इस विवाह ने दो शक्तिशाली राजवंशों को जोड़ा और आगे चलकर दुर्गावती को मध्य भारत के विशाल गोंडवाना साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति बनने का अवसर मिला। पति दलपतशाह के निधन के बाद रानी ने अपने शोक को अपनी शक्ति में बदला और अल्पवयस्क पुत्र की ओर से शासन की बागडोर संभाली। यहीं से उनके जीवन का कर्मयोग आरंभ होता है।
लगभग 16 वर्षों के शासनकाल में गढ़ा-कटंगा राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सुदृढ़ हुआ। साम्राज्य का विस्तार मध्य भारत के विस्तृत भूभाग तक था। अबुल फजल के विवरणों में गढ़ा-कटंगा की समृद्धि, गांवों की संख्या और राजस्व व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इस समृद्धि का आधार सैन्य शक्ति के साथ सुव्यवस्थित प्रशासन और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग था।
रानी दुर्गावती की सबसे बड़ी विशेषता उनका प्रशासनिक दृष्टिकोण था। उन्होंने कृषि, पशुपालन, वन संपदा, हस्तशिल्प, वस्त्र निर्माण और स्थानीय व्यापार को प्रोत्साहन दिया। चिरौंजी, महुआ, लाख, शहद, औषधीय वनस्पतियों तथा इमारती लकड़ी जैसे वन उत्पादों से ग्रामीण और वनवासी अर्थव्यवस्था को आधार मिला। जल संसाधनों का विकास कृषि और ग्रामीण जीवन की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण था।
गढ़ा-कटंगा की जल व्यवस्था आज भी अध्ययन का विषय है। तालाबों, बावलियों और जलस्रोतों के परस्पर संबंध तथा जल संचयन की स्थानीय प्रणालियां बताती हैं कि उस समय शासन की दृष्टि पानी को जीवन और अर्थव्यवस्था दोनों का आधार मानती थी। आज महानगर जल संकट से जूझ रहे हैं, ऐसे समय में रानी दुर्गावती के काल की जल-संरक्षण परंपरा हमें अपने अतीत से सीखने का अवसर देती है।
अकबर के विस्तारवाद के सामने स्वाभिमान
सोलहवीं शताब्दी में मुगल सत्ता तेजी से विस्तार कर रही थी। अकबर की साम्राज्यवादी नीति के सामने अनेक क्षेत्रीय शक्तियां दबाव में थीं। गढ़ा-कटंगा की संपन्नता और सामरिक स्थिति ने मुगल दरबार का ध्यान आकर्षित किया। आसफ खान को गढ़ा-कटंगा की ओर भेजा गया।रानी ने आत्मसमर्पण का मार्ग स्वीकार करने के स्थान पर प्रतिरोध चुना। सिंगौरगढ़ से लेकर चंडाल भाटा, गौर नदी और नर्रई तक संघर्ष आगे बढ़ा। युद्ध की परिस्थितियां लगातार बदलती रहीं। मुगल सेना के पास तोपखाना था, जबकि रानी की शक्ति भूगोल, स्थानीय युद्धकौशल, हाथी सेना और सैनिकों के अदम्य उत्साह में थी। रानी ने भूगोल को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया। घने जंगलों, संकरे मार्गों और प्राकृतिक अवरोधों का उपयोग कर उन्होंने भारी सैन्य शक्ति के सामने लंबे समय तक प्रतिरोध कायम रखा।
नर्रई : जहाँ मृत्यु भी विजय बनी
23 जून 1564 के संघर्ष के बाद निर्णायक युद्ध की भूमिका तैयार हुई। 24 जून को नर्रई की भूमि पर भीषण युद्ध हुआ। उनके नेतृत्व में सैनिकों ने मुगल सेना का प्रबल प्रतिरोध किया। युद्ध के दौरान उन्हें गंभीर चोटें आईं। परिस्थितियां उनके विरुद्ध लगातार कठिन होती गईं।
रानी के सामने जीवन बचाने का विकल्प था। उन्होंने आत्मसम्मान के साथ जीवन जिया और उसी आत्मसम्मान के साथ मृत्यु को स्वीकार किया। अपनी कटार से प्राणोत्सर्ग किया। इसके साथ ही उनका संदेश स्पष्ट था कि पराधीन जीवन से स्वाभिमानपूर्ण मृत्यु अधिक मूल्यवान है। वास्तव में यह घटना विजय और पराजय की सामान्य परिभाषाओं को चुनौती देती है। युद्धभूमि पर किसी पक्ष की सैन्य सफलता अंतिम सत्य नहीं होती। इतिहास उस पक्ष को भी विजयी मानता है जिसने अपने मूल्यों की रक्षा के लिए अंतिम क्षण तक संघर्ष किया। नर्रई में रानी दुर्गावती का शरीर भले ही गिरा हो, किेंतु उनका आदर्श आज भी खड़ा हुआ है।
इतिहास के पुनर्पाठ की आवश्यकता
ऐसे में आज एक बार फिर इस बात की जरूरत महसूस होती है कि रानी दुर्गावती को भारतीय इतिहास में पर्याप्त व्यापकता से पढ़ाया जाए। उनका जीवन किसी एक युद्ध या किसी एक समुदाय के संघर्ष तक सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे कुशल प्रशासक, दूरदर्शी शासक, योद्धा, मातृशक्ति और कर्मयोगिनी थीं।
आज जब नारी सशक्तिकरण की चर्चा आधुनिक संस्थानों, नीतियों और अधिकारों के संदर्भ में होती है, तब भारतीय इतिहास की ऐसी महिलाओं को भी सामने रखना आवश्यक है जिन्होंने सदियों पहले नेतृत्व की वास्तविक मिसाल प्रस्तुत की। रानी दुर्गावती का जीवन बताता है कि सशक्तिकरण किसी घोषणा से पैदा नहीं होता। वह शिक्षा, आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता, साहस और कर्म से निर्मित होता है।
रानी दुर्गावती की स्मृति मध्य भारत की मिट्टी में आज भी जीवित है। नर्रई की रणभूमि और उनका समाधि स्थल उस इतिहास के साक्षी हैं जहाँ एक रानी ने साम्राज्य की विशाल शक्ति के सामने अपने आत्मसम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया। उनका बलिदान हमें यह प्रश्न पूछने के लिए बाध्य करता है कि राष्ट्र और समाज के लिए हमारा कर्तव्य क्या है। कर्मयोगी वही है जो परिस्थितियों की प्रतीक्षा किए बिना अपने दायित्व को स्वीकार करता है।
रानी दुर्गावती ने यही किया। विधवा होने के बाद उन्होंने शासन संभाला, अल्पायु पुत्र का भविष्य सुरक्षित किया, राज्य का विस्तार और विकास किया, जल तथा वन संसाधनों को महत्व दिया, सेना का नेतृत्व किया और अंततः रणभूमि में अपने प्राण अर्पित कर दिए।
उनकी कहानी वास्तव में आज भारत की उस जीवंत परंपरा का प्रमाण है जिसमें मातृभूमि, स्वाभिमान और कर्तव्य को जीवन से ऊपर स्थान दिया गया। रानी दुर्गावती जैसे आज भी यही कहना चाह रही हैं कि इतिहास तलवार चलाने वालों से अधिक उन लोगों को याद रखता है जो अपने आदर्शों पर अंतिम क्षण तक अडिग रहते हैं। वस्तुत: 24 जून 1564 की सुबह भारतीय नारी शक्ति के अदम्य आत्मविश्वास का उद्घोष है। नर्रई की रणभूमि में रानी दुर्गावती ने देह छोड़ी, अपने कर्म का अमरत्व प्राप्त किया। वास्तव में यही एक कर्मयोगिनी की सबसे बड़ी विजय है।
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