
नई दिल्ली. क्वॉड विदेश मंत्रियों (Quad Foreign Ministers) की बैठक से ठीक पहले मार्को रूबियो (Marco Rubio) पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके भारत-अमेरिका (India-US) संबंधों को संभालने की गंभीर कोशिश करते दिखाई दिए। ट्रंप प्रशासन की शुल्क नीतियों, पाकिस्तान से जुड़े घटनाक्रमों और ईरान युद्ध के बाद उपजे संकट ने दोनों देशों के बीच भरोसे की जिस कमी को जन्म दिया था, रूबियो दिन भर अपने बयानों से उसे पाटने का प्रयास करते दिखे। बयानों को बारीकी से देखें, तो साफ होता है कि रिश्ते जितने रणनीतिक हैं, उतने ही जटिल भी हो चुके हैं। ट्रंप की अनिश्चित कूटनीति ने सवाल पैदा किया है कि क्या वॉशिंगटन एक भरोसेमंद दीर्घकालिक साझेदार है।
रूबियो का डैमेज कंट्रोल
मार्को रूबियो ने भारत को अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताया। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन के व्यापारिक फैसले किसी देश विशेष को निशाना बनाकर नहीं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए लिए गए थे। यह बयान इसलिए दिया गया क्योंकि भारत में यह धारणा बन रही थी कि ट्रंप प्रशासन चीन के साथ समीकरण सुधारने और पाकिस्तान के साथ सामरिक सहयोग बढ़ाने के बीच भारत को उतनी प्राथमिकता नहीं दे रहा।
जयशंकर ने भी रखा ध्यान
सबसे व्यावहारिक पक्ष जयशंकर के बयान में दिखा। उन्होंने कहा कि यदि ट्रंप प्रशासन अमेरिका फर्स्ट की नीति पर चल रहा है, तो भारत की प्राथमिकता इंडिया फर्स्ट है। डेढ़ अरब की आबादी वाले भारत के लिए सस्ता ईंधन उसकी संप्रभुता और आर्थिक प्रगति की रीढ़ है। इसलिए भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए स्रोतों का विविधीकरण जारी रखेगा।
क्या बहाल होगा भरोसा?
द्विपक्षीय बैठक के बाद जयशंकर का बातचीत को ‘अच्छी चर्चा’ बताना एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका शायद तुरंत पुराने और भरोसेमंद स्थिति में नहीं लौट पाएंगे। भारत इस समय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर धैर्य की नीति पर चल रहा है। दोनों पक्ष लगातार बातचीत बनाए रखते हैं तो इसे एक कूटनीतिक उपलब्धि माना जाएगा।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र बड़ा ऊर्जा गलियारा बनने जा रहा
राष्ट्रीय राजधानी में 26 मई को होने जा रहे क्वाड विदेश मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक से पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बड़ा बयान दिया है। रविवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि आने वाले समय में हिंद-प्रशांत क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा ऊर्जा गलियारा बनने जा रहा है। उन्होंने यह भरोसा भी जताया कि क्वाड की बैठक के बाद इसके सदस्य देशों के पास दुनिया को सुनाने के लिए एक दमदार कहानी होगी। जयशंकर ने याद दिलाया कि क्वाड ने अपने मौजूदा स्वरूप की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले शासन के दौरान की थी। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री रूबियो के साथ उनकी बातचीत में क्वाड का मुद्दा शुरुआत से ही प्रमुखता से शामिल रहा है।
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