नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार कथित तौर पर गैर-मौजूद और फर्जी न्यायिक फैसलों (fake judicial decisions) का हवाला देने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि ऐसे काल्पनिक निर्णयों पर आधारित आदेश पारित करना महज त्रुटि नहीं, बल्कि कदाचार की श्रेणी में आएगा और इसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
न्यायमूर्ति P. S. Narasimha और न्यायमूर्ति Alok Aradhe की पीठ ने कहा कि निचली अदालत द्वारा एआई-निर्मित, अस्तित्वहीन या कृत्रिम फैसलों पर भरोसा करना न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता को सीधे प्रभावित करता है।
पीठ ने अपने 27 फरवरी के आदेश में टिप्पणी की:
“इस प्रकार के निराधार और फर्जी कथित फैसलों पर आधारित निर्णय लेना, निर्णय लेने में साधारण त्रुटि नहीं है। यह कदाचार होगा और इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।”
अदालत ने कहा कि वह इस पूरे मामले के प्रभाव और जवाबदेही की विस्तृत जांच करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संस्थागत गंभीरता को देखते हुए अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani, सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta और Bar Council of India (BCI) को नोटिस जारी किया है।
साथ ही, अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता Shyam Divan को मामले में सहायता के लिए नियुक्त किया है।
यह विवाद तब उभरा जब सुप्रीम कोर्ट Andhra Pradesh High Court के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि निचली अदालत ने अपने आदेश में जिन फैसलों का हवाला दिया, वे वास्तविक नहीं थे और एआई की मदद से तैयार किए गए थे। उच्च न्यायालय ने भी माना कि संबंधित निर्णय एआई से जनरेट किए गए थे, हालांकि उसने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और दीवानी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए सुनवाई 10 मार्च के लिए तय की है। साथ ही निर्देश दिया है कि विशेष अनुमति याचिका के निपटारे तक निचली अदालत अधिवक्ता-आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही न करे।
इससे पहले 17 फरवरी को एक अन्य मामले में प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की अगुवाई वाली पीठ ने भी एआई टूल्स से तैयार याचिकाएं दाखिल किए जाने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई थी। अदालत ने संकेत दिया था कि न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल सावधानी और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख से साफ है कि न्यायिक निर्णयों में एआई के अनियंत्रित या गैर-जिम्मेदाराना उपयोग को लेकर अदालत सतर्क है और संस्थागत जवाबदेही तय करने के पक्ष में है।
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