वाशिंगटन। मस्तिष्क से जुड़ी तकनीकों यानी न्यूरोटेक्नोलॉजी (Neurotechnology) का तेजी से हो रहा विकास आने वाले समय में मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरस (António Guterres) ने बृहस्पतिवार को आगाह किया कि इन तकनीकों के जरिए सरकारों की इंसानी दिमाग तक पहुंच बनाने और उसकी गतिविधियों को प्रभावित करने की क्षमता बढ़ सकती है। इससे व्यक्तिगत निजता, मानसिक स्वतंत्रता और मौलिक मानवाधिकारों के उल्लंघन का खतरा पैदा हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूरोटेक्नोलॉजी के दुरुपयोग से लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, उनकी मानसिक स्थिति में बदलाव करने और उनकी निजी मानसिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी तक पहुंच बनाने जैसी गंभीर आशंकाएं पैदा हो सकती हैं।
गुटेरस ने कहा कि जब न्यूरोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल न्याय प्रशासन में किया जाता है, तो इससे मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अस्पतालों और चिकित्सकीय उपचार तक सीमित रहने के बजाय इन तकनीकों का जांच, न्यायिक प्रक्रिया और जेल प्रशासन में विस्तार संभावित लाभों के साथ गंभीर जोखिम भी लेकर आता है।
भारत में पुलिस पिछले करीब दो दशकों से ‘ब्रेन इलेक्ट्रिकल ऑसिलेशन सिग्नेचर’ (बीईओएस) तकनीक का इस्तेमाल करती रही है। इसके जरिए मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों का विश्लेषण कर यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि किसी संदिग्ध को अपराध से जुड़ी जानकारी है या नहीं।
हालांकि, इस तकनीक का वैज्ञानिक आधार सीमित माना जाता है और इसे भारतीय अदालतों में सामान्य रूप से स्वीकार्य सबूत का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद हत्या, दुष्कर्म और आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों सहित सैकड़ों संवेदनशील प्रकरणों में इसका इस्तेमाल किया जा चुका है।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में भी बीईओएस तकनीक को व्यापक मान्यता नहीं मिली है। वर्ष 2008 में भारत सरकार की ओर से गठित एक समिति ने भी इसे ‘सब-ऑप्टिमल’ यानी अपेक्षित मानकों से कम प्रभावी बताया था। ऐसे में जांच और न्यायिक प्रक्रिया में मस्तिष्क संबंधी तकनीकों के इस्तेमाल की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और कानूनी स्वीकार्यता पर सवाल बने हुए हैं।
न्यूरोटेक्नोलॉजी के विस्तार के साथ मस्तिष्क से जुड़े डेटा की सुरक्षा और मानसिक स्वतंत्रता को कानूनी संरक्षण देने की मांग भी तेज हो रही है। कई देश ऐसे नियम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिनसे व्यक्ति की मस्तिष्क संबंधी जानकारी के दुरुपयोग को रोका जा सके।
चिली: वर्ष 2012 में चिली ने अपने संविधान में मस्तिष्क गतिविधि की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान शामिल किए।
अमेरिका: कैलिफोर्निया, कोलोराडो और मोंटाना जैसे राज्यों ने न्यूरल डेटा की सुरक्षा के लिए कानून पारित किए हैं।
लैटिन अमेरिका: अर्जेंटीना, ब्राजील, कोलंबिया और मैक्सिको में भी न्यूरोटेक्नोलॉजी तथा मस्तिष्क संबंधी डेटा की सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
न्यूरोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल चिकित्सा, मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के उपचार और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं को समझने में मददगार हो सकता है। लेकिन जब इसका उपयोग अस्पतालों से बाहर निगरानी, पूछताछ और न्यायिक प्रक्रिया में होने लगे, तो व्यक्ति की मानसिक निजता और स्वतंत्रता की रक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।
विशेषज्ञों के सामने अब यह चुनौती है कि तकनीकी प्रगति के लाभों को बनाए रखते हुए इसके दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण कैसे लगाया जाए। ‘न्यूरो-राइट्स’ की अवधारणा इसी जरूरत से जुड़ी है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से संबंधित डेटा, मानसिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल न हो सके।
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