
इंदौर। भारत सरकार के ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत मध्यप्रदेश में भी प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजने का काम पुरातत्व विभाग के जिम्मे है। विभाग के इंदौर रीजन के अंतर्गत आने वाले 15 जिलों में भी पांडुलिपियों की खोज के लिए काम शुरू कर दिया गया है। लाखों पांडुलिपियां खोजकर अपलोड भी की जा चुकी हैं। इसके लिए हर जिले में एक समिति का गठन किया गया है। ये पांडुलिपियां मठ-मंदिरों और घरों, ट्रस्ट में खोजी जा रही हैं।
भारत सरकार के इस अभियान में मध्यप्रदेश के लिए पुरातत्व विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है। देशभर में ये अभियान 15 जून तक चलाया जाएगा। इंदौर रीजन के लिए भी अधिकारियों ने काम शुरू कर दिया है। कल जिलों में कलेक्टर की अध्यक्षता में कमेटी भी गठित की गई है। इसके जरिए पांडुलिपियों की खोज की जा रही है। पांडुलिपियों को खोजकर उनका संरक्षण कर डिजिटाइजेशन किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढिय़ों को भारतीय समाज के समृद्ध इतिहास से रूबरू होने का मौका मिले। जिले में बनाई गई कमेटी हर जिले में पांडुलिपियों के लिए संपर्क करेगी। मिली पांडुलिपियां संबंधित की ही संपत्ति होगी। बस डिजिटाइजेशन और अगर संरक्षण की आवश्यकता हुई तो विशेषज्ञों की मदद से उसका संरक्षण कर वापस संबंधित को लौटा दिया जाएगा।
समिति में ये है शामिल
टइंदौर जिले के लिए 6 लोगों की समिति बनाई गई है, जिसमें कलेक्टर इंदौर को अध्यक्ष, अपर कलेक्टर (धर्मस्व शाखा) को जिला नोडल अधिकारी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी (जिला पंचायत) को सदस्य, श्री अटलबिहारी शासकीय पीजी कॉलेज इंदौर की प्राचार्य को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त विभाग की उपसंचालक डॉ. मनीषा शर्मा और प्रभारी अधिकारी (धर्मस्व शाखा) भी इसमें शामिल हैं।
खुद भी दे सकते हैं जानकारी
पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय ने आमजन से उनके यहां या उनके पास मौजूद पांडुलिपियों की जानकारी देने की अपील की है। इसके लिए ज्ञान भारतम् ऐप डाउनलोड कर रजिस्टर्ड करना होगा और मौजूद पांडुलिपि की जानकारी भरनी होगी कि पांडुलिपि का संरक्षक कोई संस्था है या वो व्यक्तिगत है। पांडुलिपि किस तरह की है, उसकी क्या स्थिति है, किस भाषा में है, भरकर उसकी फोटो खींचकर अपलोड करना होगा। फिर विभाग संबंधित से खुद संपर्क करेगा। वहीं यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अधिकांश जैन मंदिरों और संस्थाओं में पांडुलिपियों का विशाल भंडार है। 5 चरण में ये अभियान चलेगा, जिसमें सर्वे के बाद अपलोड करना, एक्सपर्ट टीम के साथ समन्वय और फिर प्रचार-प्रसार करना भी शामिल है।
इंदौर रीजन से भी हमें हजारों पांडुलिपियां मिलने की उम्मीद है। कई हम अपलोड कर चुके हैं। हमें कई ऐसी पांडुलिपियां भी मिली हैं, जो अब तक सामने नहीं आई थीं। उम्मीद है कि ऐसे कई प्रमाण हमें और मिलेंगे। कई लोग शौकिया तौर पर ऐसी प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजकर रखते हैं। हम उन तक भी पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इंदौर रीजन में हजारों पांडुलिपियां सर्वे के दौरान सामने आई हैं।
– डॉ. मनीषा शर्मा (उपसंचालक, पुरात्तव अभिलेखागार एंव संग्रहालय, इंदौर)
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