
नई दिल्ली । राजस्थान(Rajasthan) की लोकसंगीत(FolkMusic) परंपरा में मांगणियार समुदाय का नाम बेहद सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। मुस्लिम समुदाय से जुड़े ये लोक कलाकार अपनी अनोखी सांस्कृतिक विरासत(CulturalHeritage) और संगीत साधना के कारण देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचान बना चुके हैं। खास बात यह है कि इन कलाकारों के गायन की शुरुआत भगवान कृष्ण(Krishna) के भजनों और मीराबाई के पदों से होती है। धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक समरसता(Harmony) की यह परंपरा वर्षों से लगातार चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जाती है।
मांगणियार समुदाय राजस्थान के राजपूत राजाओं और जमींदार परिवारों से लंबे समय तक जुड़ा रहा है। ये कलाकार दरबारी संगीतकार के रूप में राजपरिवारों के यहां विशेष अवसरों पर गायन करते थे। चूंकि अधिकांश संरक्षक परिवार भगवान कृष्ण के भक्त थे, इसलिए सुबह के समय उनके आंगन में कृष्ण भजन गाने की परंपरा शुरू हुई। धीरे-धीरे यह परंपरा मांगणियारों की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।
आज भी मांगणियार कलाकार सुबह नमाज अदा करने के बाद जब अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र कमायचा के साथ रियाज शुरू करते हैं, तो उनके सुरों में सबसे पहले कृष्ण भक्ति और मीरा के पद सुनाई देते हैं। यही अनूठा मेल राजस्थान की साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करता है। संगीत के जरिए धर्म और समाज की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानी जुड़ाव की जो तस्वीर यह समुदाय पेश करता है, वह लोगों को गहराई से प्रभावित करती है।
लोकसंगीत की इसी समृद्ध परंपरा ने मांगणियार कलाकारों को बॉलीवुड तक पहुंचाया। स्वरूप खान और मामे खान जैसे कलाकारों ने अपनी आवाज और राजस्थानी संगीत शैली से फिल्मी दुनिया में अलग पहचान बनाई है। दोनों कलाकार एक ही संगीत परिवार से जुड़े हैं और बचपन से ही लोकसंगीत की शिक्षा लेते आए हैं। इनके गीतों में राजस्थान की मिट्टी की खुशबू, लोकधुनों की गहराई और पारंपरिक गायकी का प्रभाव साफ महसूस होता है।
स्वरूप खान ने कई चर्चित फिल्मी गीतों को अपनी आवाज दी, जिनमें राजस्थानी लोक रंग की झलक ने दर्शकों को खूब आकर्षित किया। उनके गाए गीतों में पारंपरिक लोकसंगीत और आधुनिक संगीत का सुंदर संतुलन देखने को मिला। वहीं मामे खान ने भी अपनी दमदार आवाज और मंच प्रस्तुति के जरिए देश-विदेश में बड़ी पहचान हासिल की। शादियों, सांस्कृतिक आयोजनों और संगीत समारोहों में उनके गीत आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
मांगणियार कलाकारों की खासियत सिर्फ उनका संगीत नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली और परंपराओं में भी दिखाई देती है। यह समुदाय सदियों से संगीत को अपनी पहचान और आजीविका दोनों मानता आया है। परिवार के बड़े सदस्य बच्चों को बचपन से ही लोकगीत, राग, ताल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की शिक्षा देना शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि उनकी गायकी में वर्षों की साधना और सांस्कृतिक गहराई साफ नजर आती है।
राजस्थान का यह लोकसंगीत आज वैश्विक मंचों तक पहुंच चुका है, लेकिन मांगणियार समुदाय ने अपनी जड़ों और परंपराओं को आज भी मजबूती से संभालकर रखा है। कृष्ण भजनों से शुरू होने वाला उनका संगीत केवल कला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और साझा विरासत का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
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