
रांची। तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) और शिवेसना यूबीटी (Shiv Sena – UBT) में हालिया बड़ी टूट ने न सिर्फ इन पार्टियों की स्थिति बदली है, बल्कि लोकसभा में दोनों बड़े गठबंधनों राजग और इंडिया ब्लॉक (INDIA BLOC) के समीकरण भी उलट-पलट दिए हैं। मसलन, राजग सरकार में अब तक दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी का दर्जा रखने वाली तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) (Telugu Desam Party – TDP) एक स्थान खिसककर तीसरे नंबर पर पहुंच गई है और तीसरे नंबर पर रही जनता दल यूनाइटेड पांचवे नंबर पर चली गई है।
हालांकि, अभी टूट को आधिकारिक मान्यता मिलना बाकी है। लेकिन राजग को मिलने वाले समर्थन के लिहाज से देखें तो टीडीपी के स्थान पर गैरमान्यता प्राप्त एनसीपीआई (जिसमें तृणमूल कांग्रेस के बागियों ने शामिल होने की घोषणा की है) दूसरी बड़ी सहयोगी बन चुकी है। वहीं, शिवसेना शिंदे गुट ने अपनी ताकत बढ़ाकर जदयू की जगह ले ली है। दो दलों में टूट और द्रमुक के किनारा करने की घटना ने विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के समीकरणों में भी आमूलचूल परिवर्तन की जमीन तैयार कर दी है।
इंडिया ब्लॉक में अब दहाई आंकड़े में सीट वाले बचे दो ही दल
इंडिया ब्लॉक में अब दहाई आंकड़े में सीट वाले दो ही दल (कांग्रेस 98 व सपा 37) बचे हैं। कभी संख्या बल की दृष्टि से तीसरे सबसे बड़े दल के स्थान पर काबिज तृणमूल कांग्रेस 6 सीटों के साथ पांचवे तो छठे स्थान पर रही एनसीपी पवार (8) अब विपक्षी ब्लॉक में तीसरे स्थान पर काबिज हो गई है। कभी नौ सीटों वाली शिवसेना यूबीटी विपक्षी ब्लॉक में पांचवे स्थान पर थी, मगर अब वह तीन सीटों पर सिमटकर चार-चार सीटों वाली राजद, झामुमो, माकपा और आईयूएमएल से पीछे नौंवे स्थान पर पहुंच गई है।
महाराष्ट्र में शिंदे की चांदी
शिवसेना यूबीटी में टूट से शिवसेना शिंदे को महाराष्ट्र में जबर्दस्त लाभ हुआ है। यूबीटी के बागियों के विलय को मान्यता मिलने के बाद शिंदे के पास 13 सांसद होंगे जो राज्य में कांग्रेस के बराबर और भाजपा से चार, एनसीपी अजित से आठ ज्यादा है। इस टूट के बाद एनसीपी (8) भी शिवसेना यूबीटी से आगे निकल गई है।
मोदी सरकार के संभावित विस्तार में दिखेगा असर
इस बदलाव का असर इसी महीने संभावित मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले विस्तार में दिखेगा। वर्तमान में शिवसेना शिंदे गुट के एक ही स्वतंत्र प्रभार राज्य का दर्जा प्राप्त मंत्री हैं। अब चूंकि पार्टी के पास जदयू से एक अधिक सीट है, ऐसे में उसे जदयू की तरह एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री का पद मिल सकता है। दूसरी ओर गैर मान्यताप्राप्त एनसीपीआई जो अब मोदी सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी है, उसे लेकर भाजपा उलझन में है। राज्य इकाई नहीं चाहती कि तृणमूल के बागियों को मंत्री पद देकर उपकृत किया जाए।
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