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अमेरिकी अदालत ने ट्रंप प्रशासन को दी बड़ी राहत, दी 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ वसूली जारी रखने की अनुमति

June 12, 2026

वॉशिंगटन. अमेरिका (America) में आयात शुल्क (Import duty) को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई के बीच ट्रंप प्रशासन (Trump administration) को बड़ी राहत मिली है। वॉशिंगटन स्थित संघीय अपील अदालत ने फैसला दिया है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक अमेरिकी सरकार दुनिया भर से आने वाले सामान पर लगाए गए 10 प्रतिशत टैरिफ (10% global tariffs) की वसूली जारी रख सकती है। अदालत के इस फैसले को ट्रंप प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण जीत माना जा रहा है, क्योंकि इससे सरकार को फिलहाल अपनी व्यापार नीति लागू रखने का रास्ता मिल गया है।

निचली अदालत ने बताया था अवैध
पिछले महीने न्यूयॉर्क स्थित अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने छोटे कारोबारियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इन टैरिफ को अवैध करार दिया था। अदालत की बहुमत पीठ ने माना था कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकारों की सीमा से आगे बढ़कर यह कदम उठाया है। अदालत ने कहा था कि टैरिफ लगाने का यह फैसला कानून द्वारा अधिकृत नहीं था।


  • अपील अदालत ने क्यों दी राहत?
    अपील अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ट्रंप प्रशासन की दलीलें पहली नजर में मजबूत दिखाई देती हैं और सरकार का पक्ष अंतिम सुनवाई में सफल हो सकता है। इसी आधार पर अदालत ने अंतिम निर्णय आने तक टैरिफ वसूली जारी रखने की अनुमति दे दी।

    क्या है पूरा मामला?
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल फरवरी में दुनिया के अधिकांश देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत का अस्थायी टैरिफ लगाया था। यह फैसला 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लिया गया था। यह प्रावधान राष्ट्रपति को सीमित अवधि के लिए अधिकतम 15 प्रतिशत तक वैश्विक आयात शुल्क लगाने की अनुमति देता है। हालांकि इसकी अवधि 150 दिनों तक ही सीमित होती है, जिसके बाद इसे जारी रखने के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है।

    व्यापार घाटे को लेकर बहस
    इस मामले का एक बड़ा पहलू यह भी है कि क्या अमेरिका का व्यापार घाटा अंतरराष्ट्रीय भुगतान संबंधी गंभीर समस्या की श्रेणी में आता है या नहीं। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि बढ़ता व्यापार घाटा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है, जबकि विरोधी पक्ष इस व्याख्या से सहमत नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है मामला
    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अंततः अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। यदि ऐसा होता है तो वहां से आने वाला फैसला अमेरिका की व्यापार नीति और राष्ट्रपति के आर्थिक अधिकारों को लेकर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

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