नई दिल्ली। इटली (Italy) से सामने आए एक हैरान करने वाले मामले ने दुनिया भर के इतिहास प्रेमियों (History enthusiasts) को चौंका दिया है। यहां एक व्यक्ति ने कथित तौर पर नकली रोमन एम्फीथिएटर (Open-air theater) तैयार कर उसे प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर बताकर वर्षों तक पर्यटकों को गुमराह किया। पत्थरों जैसे दिखने वाले खंभे, टूटी सीढ़ियां, मूर्तियां और कृत्रिम झील देखकर लोग इसे सदियों पुराना पुरातात्विक स्थल समझते रहे। लेकिन विशेषज्ञों की जांच में पूरा सच सामने आ गया।
खुद को खोजकर्ता बताकर गढ़ी पूरी कहानी
ब्रिटिश अखबार द मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, इटली के विचेंजा शहर के पास रहने वाले 69 वर्षीय फ्रेंको मालोसो, जो खुद को ‘वॉन रोजेनफ्रांज’ कहता था, दावा करता था कि उसने दुनिया का सबसे पुराना खुला रोमन एम्फीथिएटर खोज निकाला है। उसने पहाड़ी इलाके में ऐसा सेट तैयार किया, जो पहली नजर में किसी प्राचीन रोमन सभ्यता के अवशेष जैसा दिखाई देता था।
हर पर्यटक से वसूली जाती थी एंट्री फीस
फ्रेंको इस कथित ऐतिहासिक स्थल को देखने आने वाले पर्यटकों से 35 पाउंड (करीब 4 हजार रुपये) प्रवेश शुल्क लेता था। इसके बाद वह पूरे परिसर का भ्रमण कराते हुए दावा करता कि यह स्थल वर्ष 393 ईस्वी से भी पहले का है और रोमन साम्राज्य के महत्वपूर्ण आयोजन यहीं हुआ करते थे। उसकी कहानी सुनकर अधिकांश पर्यटक बिना किसी संदेह के उस पर भरोसा कर लेते थे।
पर्यटकों को प्रभावित करने के लिए उसने कई चर्चित ऐतिहासिक और साहित्यिक पात्रों के नाम भी अपनी कहानी में शामिल कर दिए। वह दावा करता था कि रोमन सम्राट जूलियस सीजर इस स्थान पर आया करते थे। इतना ही नहीं, उसने यह भी कहा कि प्रसिद्ध प्रेम कथा ‘रोमियो एंड जूलियट’ की नायिका जूलियट कैपुलेट ने अपना बचपन इसी इलाके में बिताया था। इन दावों ने इस जगह को लेकर लोगों की उत्सुकता और बढ़ा दी।
प्रशासन भी मान बैठा असली धरोहर
फ्रेंको ने खुद को समाजसेवी, कारोबारी और ऑर्केस्ट्रा कंडक्टर बताकर अपनी विश्वसनीयता बढ़ाई। उसकी बातों पर स्थानीय प्रशासन ने भी भरोसा कर लिया। इतना ही नहीं, यूरोपीय संघ की फंडिंग वाले एक पर्यटन ऐप में भी इस कथित ऐतिहासिक स्थल को शामिल कर लिया गया, जिससे यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ती गई।
लैंडस्लाइड की कहानी से बुना भ्रम
वह लोगों को बताता था कि वर्ष 2005 में भूस्खलन (लैंडस्लाइड) के बाद यह प्राचीन स्थल जमीन के नीचे से बाहर आया। उसके मुताबिक यहां नवपाषाण काल, यूनानी और रोमन सभ्यता के अवशेष मिले थे। इसी कहानी के आधार पर उसने पूरे स्थल को ऐतिहासिक खोज के रूप में प्रचारित किया।
विशेषज्ञों की जांच में सामने आई सच्चाई
साल 2016 में पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। पुरातत्व विशेषज्ञों की टीम ने जब स्थल का निरीक्षण किया तो पता चला कि वहां मौजूद कोई भी संरचना प्राचीन नहीं थी। जांच में सामने आया कि खंभे, मूर्तियां और अन्य संरचनाएं फाइबरग्लास, पेपर माशे और आधुनिक निर्माण सामग्री से बनाई गई थीं। कृत्रिम झील भी प्राकृतिक नहीं थी और पूरे इलाके को समतल कर ऐसा रूप दिया गया था कि वह प्राचीन रोमन थिएटर जैसा दिखे।
पकड़े जाने के बाद भी करता रहा नए दावे
जांच के बाद भी फ्रेंको ने अपनी बात बदलने के बजाय नए-नए दावे करने शुरू कर दिए। उसने एक ब्लॉग में लिखा कि इस एम्फीथिएटर पर कब्जा करने के लिए माफिया ने कई लोगों की हत्या कर दी थी और उसी माफिया ने उस पर हमला किया, जिसमें वह घायल हो गया तथा उसका बेटा लापता हो गया। इससे पहले वह यह दावा भी कर चुका था कि इस स्थल का 1870 और फिर 1980 के दशक में जीर्णोद्धार किया गया था।
अदालत ने सुनाई सजा
करीब एक दशक तक चली जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने फ्रेंको मालोसो को दोषी करार दिया। उस पर अवैध निर्माण, नकली पुरातात्विक संरचनाएं तैयार करने और लोगों को गुमराह करने के आरोप सिद्ध हुए। अदालत ने उसे दो साल चार महीने की जेल, 3 हजार यूरो जुर्माना और पूरे परिसर से सभी नकली निर्माण हटाने का आदेश दिया।
क्या सीख देता है यह मामला?
यह घटना बताती है कि आकर्षक कहानियां और आत्मविश्वास से किए गए दावे लोगों को आसानी से भ्रमित कर सकते हैं। इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व जैसे विषयों में भी किसी दावे को सच मानने से पहले उसकी प्रमाणिकता और आधिकारिक पुष्टि करना जरूरी है। इटली का यह मामला इसी बात का बड़ा उदाहरण बन गया है कि झूठ चाहे कितनी भी मजबूती से गढ़ा जाए, जांच के सामने आखिरकार सच सामने आ ही जाता है।
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