
जबलपुर। विक्टोरिया अस्पताल का ड्यूटी सिस्टम पूरी तरह से लडख़ड़ा चुका है। अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही का आलम यह है कि कैजुअल्टी से लेकर ओपीडी तक पूरी इलाज व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। हद तो तब हो गई जब अस्पताल में डॉक्टरों और कथित जिम्मेदारों के बीच आपसी तालमेल का इतना भयंकर अकाल दिखा कि जो चिकित्सक ड्यूटी पर आए ही नहीं, उनके नाम बकायदा ओपीडी पर्ची पर लिखकर मरीजों को थमाए जा रहे हैं।अस्पताल के भीतर मची इस खींचतान और अव्यवस्था के कारण इलाज के लिए दूर-दराज से आने वाले गरीब और बेबस मरीज सिर्फ पर्ची हाथ में थामे यहाँ से वहाँ भटकने को मजबूर हैं।
अस्पताल में हाजिरी ध्यान निजी क्लिनिक पर!
सूत्रों ने विक्टोरिया अस्पताल के डॉक्टरों की कार्यप्रणाली की पोल खोलते हुए बताया कि अधिकांश सीनियर चिकित्सकों का पूरा ध्यान जिला अस्पताल से ज्यादा अपने निजी क्लीनिकों और अस्पतालों पर केंद्रित रहता है। आधा-अधूरा काम और रवानगी: ये सरकारी डॉक्टर अस्पताल में जैसे-तैसे अपनी हाजिरी दर्ज कराते हैं और फिर नियम-कायदों को ताक पर रखकर अपने निजी ठिकानों पर मरीजों को देखने के लिए निकल जाते हैं।पर्ची का खेल और मरीजों की प्रताडऩा: जब काउंटर से अनुपस्थित डॉक्टर के नाम की पर्ची कट जाती है, तो मरीज उस ओपीडी कक्ष के चक्कर काटता रहता है। वहां मौजूद अन्य स्टाफ गायब डॉक्टर का नाम देखकर दवा लिखने तक से मना कर देता है और मरीज को अगले दिन आने की बात कहकर टरका दिया जाता है।
कैजुअल्टी जैसे विभाग में भी आनन-फानन का खेल
अस्पताल की 24 घंटे चलने वाली सबसे महत्वपूर्ण कैजुअल्टी व्यवस्था भी जिम्मेदारों की लापरवाही का शिकार है। कई बार तो आपातकालीन स्थिति में भी मौके पर डॉक्टर नदारद मिलते हैं। जब ऐन वक्त पर कोई गंभीर मरीज आता है और हड़कंप मचता है, तब आनन-फानन में किसी अन्य डॉक्टर की ड्यूटी फोन करके लगाई जाती है। इसके अलावा ओपीडी में सीनियर डॉक्टरों की जगह जूनियर डॉक्टरों के भरोसे पूरा इलाज छोड़ दिया गया है। ऐसे में यदि कोई बड़ी अनहोनी हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह तय करने वाला कोई नहीं है।
अधिकारी बदले पर नहीं बदले विक्टोरिया अस्पताल के दिन
जिला अस्पताल में समय-समय पर प्रशासनिक फेरबदल होते रहते हैं, सिविल सर्जन से लेकर अन्य आला अफसर बदलते हैं, लेकिन अस्पताल की दुर्दशा जस की तस बनी हुई है। जो भी नया अधिकारी आता है, उसे या तो फाइलों में उलझा दिया जाता है या वह खुद उलझ जाता है। जिन अधिकारियों को अस्पताल की व्यवस्था सुधारने और औचक निरीक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वे खुद वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।
अस्पताल परिसर के भीतर चल रहा दलालों का समानांतर सिस्टम
विक्टोरिया अस्पताल में केवल डॉक्टर और स्टाफ की मनमर्जी नहीं चल रही, बल्कि यहाँ दलालों का एक संगठित नेटवर्क खुलेआम घूम रहा है। ये दलाल सीधे सीधे ग्रामीण और भोले-भले मरीजों को अपने चंगुल में फंसाते हैं। कभी जल्दी इलाज कराने के नाम पर तो कभी बाहर की दवाइयां और जांच सस्ते में कराने का झांसा देकर ये दलाल मरीजों से दो-चार सौ रुपये झटकते हैं और पलक झपकते ही भीड़ में गायब हो जाते हैं।
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