कोलकाता। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही सियासी माहौल गर्म हो गया है। पिछली बार आठ चरणों में हुए मतदान के विपरीत इस बार केवल दो चरणों में चुनाव होने की संभावना ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की पार्टी टीएमसी (All India Trinamool Congress) लगातार चौथी बार जीत दर्ज कर इतिहास रचेगी या भाजपा (Bharatiya Janata Party) पहली बार सत्ता का दरवाजा खोल पाएगी।
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर पहले से ही सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। भाजपा कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और 15 साल की कथित एंटी-इन्कम्बेंसी को बड़ा मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी है, जबकि ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को मजबूत बनाए रखने की कोशिश में जुटी हैं। राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 28 प्रतिशत मानी जाती है, जो चुनावी समीकरण में अहम भूमिका निभाती है।
तीन देशों भूटान, नेपाल और बांग्लादेश से घिरे इस राज्य में भाजपा पिछले ढाई दशक से सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। पिछले चुनाव में पार्टी ने Communist Party of India (Marxist) सहित वाम दलों और Indian National Congress को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया था, लेकिन सरकार बनाने का सपना अधूरा रह गया।
इस बार भाजपा ने घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया है। साथ ही पिछले चुनाव से सबक लेते हुए पार्टी ने दलबदल कर आए नेताओं की जगह पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट देने की रणनीति अपनाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पिछले चुनाव में करीब 36 सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोट से भी कम था। कई सीटों पर तो हार-जीत कुछ सौ वोटों से तय हुई थी। ऐसे में माना जा रहा है कि इन सीटों पर थोड़ा सा भी वोटों का झुकाव बदला तो सत्ता का गणित पूरी तरह बदल सकता है।
उत्तर बंगाल और जंगलमहल पर नजर
भाजपा की रणनीति उत्तर बंगाल और जंगलमहल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की है। नॉर्थ बंगाल के कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जैसे जिलों में भाजपा को पिछले चुनाव में अच्छी सफलता मिली थी। वहीं, ममता के नेतृत्व में तृणमूल सरकार सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे उतर रही है। तृणमूल का दावा है कि महिलाओं, किसानों और गरीब तबकों के लिए चलाई गई योजनाओं ने उसे मजबूत जनसमर्थन दिलाया है।
मुस्लिम वोट बैंक बंगाल की राजनीति में निर्णायक माना जाता है। इसे साधे रखने के लिए ममता बनर्जी लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क और संसद तक विरोध जताना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
दूसरी ओर, भाजपा आदिवासी, मतुआ और महिला मतदाताओं को एकजुट कर पिछली बार के लगभग सात प्रतिशत वोट अंतर को कम करने की कोशिश में है। राज्य में नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari भी घुसपैठ के मुद्दे पर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।
नए समीकरण पर होगी नजर
यहां जनादेश के लिए मुस्लिम वोट बैंक सबसे अहम है। दशकों तक यह वोट बैंक जिसके साथ रहा, सत्ता उसी के पास रही। इस बार मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी आईएसएफ के बीच गठबंधन की संभावना बन रही है। एआईएमआईएम बिहार के सीमांचल से लगते दिनाजपुर, मालदा, कबीर मुर्शिदाबाद और सिद्दीकी कोलकाता क्षेत्र में तृणमूल के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तृणमूल अपना किला बचा पाएगी या भाजपा पहली बार बंगाल की सत्ता तक पहुंचने में कामयाब होगी।
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