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1.5 डिग्री की चेतावनी: पिघल जाएंगे दुनिया के आधे ग्लेशियर! गंगा में भीषण बाढ़ का खतरा

November 03, 2026

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन (Climate change) के बढ़ते खतरे के बीच ग्लेशियरों (Glaciers) के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी सामने आई है। तापमान (Temperature) में वृद्धि जारी रहने पर दुनिया के बड़े हिस्से में ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने और बाढ़ का खतरा गहरा सकता है। इसका असर हिमालयी क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में लटकते ग्लेशियरों की स्थिति और उनमें दिखाई दे रही दरारों ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई है। ऐसे ग्लेशियर टूटकर गिरते हैं तो स्थानीय स्तर पर अचानक बाढ़ और बड़े पैमाने पर तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।

तुर्किये में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी-31) से पहले जारी एक रिपोर्ट में ध्रुवीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों पर उसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने में विफलता के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और स्थानीय बाढ़ के जोखिम को अलग-अलग वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के रूप में समझना जरूरी है।



  • 1.5 डिग्री की सीमा क्यों है अहम?

    जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिकों की चेतावनी में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा का विशेष महत्व है। यह औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में वैश्विक औसत तापमान वृद्धि की सीमा है, जिसे पेरिस जलवायु समझौते के तहत सीमित रखने का लक्ष्य तय किया गया है।

    तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों के पिघलने और समुद्र में बर्फ के प्रवाह से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है। यदि उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती नहीं की गई तो आने वाले दशकों और सदियों में इसके प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं।

    कुछ आकलनों में ग्लेशियरों के बड़े हिस्से के दीर्घकालिक नुकसान की आशंका जताई गई है। हालांकि, तापमान में प्रत्येक 0.1 डिग्री की वृद्धि होते ही दुनिया के आधे ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे, इस दावे को निश्चित वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी तरह, समुद्र का जलस्तर नौ मीटर बढ़ने की आशंका को किसी निकट भविष्य की घटना के रूप में प्रस्तुत करना भी भ्रामक होगा। इस स्तर की वृद्धि मुख्य रूप से बड़े हिमखंडों और बर्फ की चादरों के दीर्घकालिक नुकसान से जुड़ी संभावनाओं के संदर्भ में देखी जाती है।

    हिमालय के लटकते ग्लेशियर बढ़ा रहे चिंता

    हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने के साथ उनकी आंतरिक संरचना में भी बदलाव हो रहे हैं। पहाड़ों की ढलानों पर लटके ग्लेशियर विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। इनमें दरारें बढ़ने या बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरने से अचानक बर्फ, चट्टानों और मलबे का प्रवाह पैदा हो सकता है।

    रिपोर्ट में उद्धृत एक शोध के अनुसार, हिमालय में करीब 219 लटकते ग्लेशियर हैं। इनमें से लगभग 60 अलकनंदा नदी के बेसिन में बताए गए हैं। इन ग्लेशियरों की स्थिति पर निगरानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके टूटने या इनके कारण झीलों और नदियों में अचानक पानी बढ़ने से निचले इलाकों में खतरा पैदा हो सकता है।

    बदरीनाथ और अलकनंदा क्षेत्र में बाढ़ का खतरा

    उत्तराखंड के बदरीनाथ और अलकनंदा बेसिन में ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई है। यदि किसी लटकते ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरता है, तो उससे बर्फ, चट्टान और मलबे का तेज प्रवाह उत्पन्न हो सकता है। इससे आसपास के क्षेत्रों में जान-माल का नुकसान होने की आशंका रहती है।

    यदि ऐसी घटना से नदी का प्रवाह अचानक बाधित हो जाए और बाद में पानी तेजी से आगे बढ़े, तो अलकनंदा के निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है। अलकनंदा आगे चलकर गंगा नदी का हिस्सा बनती है, इसलिए बड़े घटनाक्रम का प्रभाव नदी के निचले क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। हालांकि, किसी विशेष ग्लेशियर में दरारें दिखाई देने का अर्थ यह नहीं है कि उसका टूटना निश्चित है या गंगा में अनिवार्य रूप से विनाशकारी बाढ़ आएगी। इसके लिए स्थानीय भूगर्भीय स्थिति, तापमान, बर्फ की संरचना और जलप्रवाह की निगरानी आवश्यक है।

    अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने से बढ़ रहा समुद्र का स्तर

    जलवायु परिवर्तन का असर केवल हिमालय तक सीमित नहीं है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों में होने वाले बदलाव वैश्विक समुद्र स्तर को प्रभावित करते हैं। समुद्र के गर्म होने से पानी फैलता है और जमीन पर मौजूद बर्फ के पिघलकर समुद्र में पहुंचने से जलस्तर और बढ़ता है।

    समुद्र के स्तर में वृद्धि से तटीय शहरों, द्वीपीय क्षेत्रों और निचले समुद्रतटीय इलाकों पर बाढ़ तथा कटाव का खतरा बढ़ता है। इसका असर करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और पेयजल व्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी खास क्षेत्र में जलस्तर कितना बढ़ेगा, यह स्थानीय भूगोल और अन्य परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

    उत्सर्जन घटाने से कम हो सकता है खतरा

    जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना आवश्यक है। रिपोर्ट में हर साल उत्सर्जन में पांच प्रतिशत की कमी लाने के संभावित लाभ का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस लक्ष्य का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कटौती किस आधार वर्ष से की जा रही है, किन गैसों को शामिल किया गया है और यह प्रक्रिया कितने वर्षों तक जारी रहती है।

    कार्बन उत्सर्जन घटाने के साथ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने के उपाय भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इससे तापमान वृद्धि को सीमित करने में मदद मिलेगी और ग्लेशियरों के नुकसान की गति कम की जा सकेगी। हालांकि, एक बार बड़े पैमाने पर पिघल चुके ग्लेशियरों को उनकी पुरानी स्थिति में लौटने में बहुत लंबा समय लग सकता है।

    समय रहते निगरानी और तैयारी जरूरी

    हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ग्लेशियरों की नियमित निगरानी, दरारों का वैज्ञानिक आकलन, संभावित बाढ़ क्षेत्रों की पहचान और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियां विकसित करना जरूरी है। नदी घाटियों में निर्माण कार्यों और पर्यटन गतिविधियों की योजना बनाते समय भी आपदा जोखिम को ध्यान में रखना होगा।

    जलवायु परिवर्तन के खतरे को पूरी तरह टालना संभव न भी हो, तो उत्सर्जन में कटौती और बेहतर आपदा प्रबंधन से उसके प्रभावों को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है। हिमालयी ग्लेशियरों की सुरक्षा और नदियों के आसपास रहने वाली आबादी की तैयारी आने वाले वर्षों में बेहद महत्वपूर्ण होगी।

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