नई दिल्ली। मुहर्रम (Muharram) में खुद को चोट पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन शिया मुसलमान (Shia Muslim) हर साल एक खास मौके पर मातम मनाते हैं, धधकते अंगारों पर चलते हैं, जंजिरों से खुद को चोट पहुंचाते हैं.
मुहर्रम का महीना शिया और सुन्नी दोनों के लिए अहमियत रखता है, लेकिन इसे मनाने का तरीका काफी अलग-अलग होता है. इस महीने में सुन्नी लोग अल्लाह की इबादत करते हैं. वहीं, शिया मुसलमान मातम मनाते हैं.
27 जून से मुहर्रम का महीना शुरू हो गया है. मुहर्रम के दसवें दिन को आशूरा कहते हैं, जो इस महीने का सबसे अहम दिन होता है. इस साल आशूरा का दिन 6 जुलाई को मनाया जाएगा, जिसे यौम-ए-आशूरा भी कहते हैं.
10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन इमाम हुसैन और उनके 72 साथी कर्बला की जंग में शहीद हो गए थे. इसलिए इमाम हुसैन की शहादत की याद में आशूरा का दिन मनाया जाता है. शिया मुसलमान इस दिन गम मनाते हैं और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं.
इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए शिया समुदाय के लोग खुद को तकलीफ देकर, मजलिस में शामिल होकर अपना गम जाहिर करते हैं. वहीं, सुन्नी मुसलमान भी मुहर्रम मनाते हैं, लेकिन वे इस दिन मातम नहीं मनाते हैं.
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