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CJI के नाम पर फर्जी वेबसाइट का खुलासा: साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, आम लोग रहें सतर्क

February 22, 2026

नई दिल्ली। साइबर अपराध (Cyber ​​crimes) किस हद तक फैल चुका है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के शीर्ष न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति के नाम का भी दुरुपयोग किया जा रहा है। जस्टिस सूर्यकांत (Justice Suryakant) ने खुद बताया कि उनके नाम से फर्जी वेबसाइट और डिजिटल प्रोफाइल (digital profile) बनाकर लोगों को ठगने की कोशिश की जा रही है। यह मामला न केवल आम नागरिकों, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत है।



  • साइबर अपराध अब सीमाओं से परे
    साइबर सुरक्षा पर आयोजित एक सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगभग हर दूसरे दिन उनके नाम से नई फर्जी ऑनलाइन पहचान सामने आती है। उन्होंने कहा कि एक बार उनकी बहन और बेटी को भी ऐसे ही एक फर्जी प्लेटफॉर्म से संदेश मिला, जिसकी जांच करने पर पता चला कि ये नेटवर्क नाइजीरिया से संचालित हो रहे थे।

    यह दर्शाता है कि साइबर अपराध अब किसी एक देश तक सीमित नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित रूप ले चुका है।

    लाखों शिकायतें लंबित, बढ़ती जा रही चुनौती

    उन्होंने इस समस्या की गंभीरता बताते हुए कहा कि देशभर में साइबर ठगी से जुड़ी लाखों शिकायतें लंबित हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सरकार, संस्थानों और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।

    ‘डिजिटल अरेस्ट’ और डीपफेक—नए खतरे

    मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि अब ठगी के तरीके भी बदल रहे हैं।

    “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर लोगों को डराकर पैसे ऐंठे जा रहे हैं।

    डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर किसी की छवि और सम्मान को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

    कई मामलों में बुजुर्गों की जीवनभर की जमा पूंजी मिनटों में साफ हो गई।

    उन्होंने कहा कि ऐसे अपराध आर्थिक नुकसान के साथ सामाजिक और भावनात्मक विश्वास भी तोड़ते हैं।

    अनजान लिंक पर क्लिक करना सबसे बड़ा जोखिम

    विशेषज्ञों के अनुसार, साइबर ठग आमतौर पर इन तरीकों का इस्तेमाल करते है।

    झटपट लोन ऑफर
    ट्रैफिक चालान का लिंक
    केवाईसी अपडेट का संदेश
    पार्सल डिलीवरी या बैंक अलर्ट

    जैसे ही व्यक्ति लिंक खोलता है, उसकी निजी जानकारी या बैंकिंग डिटेल्स ठगों तक पहुंच जाती हैं। बैंक या सरकारी संस्थाएं कभी भी लिंक भेजकर संवेदनशील जानकारी नहीं मांगतीं।

    ओटीपी और कॉल फ्रॉड से सावधान

    आजकल ठग खुद को बैंक अधिकारी, पुलिस या जांच एजेंसी बताकर फोन करते हैं और ओटीपी, यूपीआई पिन या एटीएम जानकारी मांगते हैं।
    साफ नियम है:
    कोई भी संस्था फोन पर ओटीपी नहीं मांगती।
    ऐप डाउनलोड और स्क्रीन शेयरिंग में बरतें सावधानी
    केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही ऐप डाउनलोड करें।
    किसी के कहने पर स्क्रीन शेयर या रिमोट एक्सेस ऐप इंस्टॉल न करें।
    यूपीआई और बैंक ट्रांजैक्शन अलर्ट हमेशा चालू रखें।
    सोशल मीडिया पर ज्यादा जानकारी देना भी खतरा

    मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, पता या परिवार की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा करने से ठग फर्जी पहचान बनाकर निशाना बना सकते हैं। मजबूत और अलग-अलग पासवर्ड रखना जरूरी है।

    ठगी का शिकार होने पर तुरंत करें ये काम
    अगर साइबर फ्रॉड हो जाए तो देरी न करें—
    तुरंत राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें।
    साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।

    समय पर शिकायत करने से पैसा रिकवर होने की संभावना बढ़ जाती है।

    परिवार की भूमिका भी अहम
    विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराध का सबसे बड़ा शिकार बुजुर्ग और नए डिजिटल उपयोगकर्ता बन रहे हैं। इसलिए परिवार के सदस्यों को उन्हें लगातार जागरूक करना चाहिए।

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