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ब्रह्मोस : लाहौर-कराची, रावलपिंडी में पलक झपकते तबाही, रिमोट कंट्रोल के एक बटन पर आधा पाकिस्तान

March 06, 2026

नई दिल्ली। देश और दुनिया में सामरिक हालात लगातार बदल रहे हैं. पहले रूस (Russia) का यूक्रेन (Ukraine) पर अटैक, फिर इजरायल (Israel)का गाजा पट्टी (Gaza Strip) के खिलाफ अभियान और अब ईरान पर हमले ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. ईरान ने पलटवार करते हुए अरब देशों में स्थित अमेरिकी सैन्‍य बेस को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए. तेहरान की ओर से 15 से ज्‍यादा देशों पर अटैक किया गया. इससे हालात और भी बिगड़ गए हैं. इन सबमें कॉमन बात एरियल स्‍ट्राइक है. अमेरिका और इजरायल की तरफ से हवाई हमले किए गए तो ईरान ने भी जवाब में एरियल स्‍ट्राइक ही किया है. पिछले कुछ दशकों में एयर फायर पावर की ताकत काफी निर्णायक साबित हो रही है. इसका मतलब यह हुआ कि जिस देश के पास जितने उन्‍नत फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन सिस्‍टम हैं, मॉडर्न वॉरफेयर में वह उतना ज्‍यादा ताकतवर है.


  • ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात सच साबित हुई थी. जिस ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने पिछले साल पाकिस्‍तान में तबाही मचाई थी, भारत अब उसी ब्रह्मोस मिसाइल को और ताकतवर बनाने जा रहा है. ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज को 800 किलोमीटर करने पर तेजी से काम चल रहा है. उम्‍मीद है कि ब्रह्मोस का नया वैरिएंट साल 2030 से पहले एयरफोर्स और नेवी की फ्लीट में शामिल हो जाएगी. नए वैरिएंट को ब्रह्मोस-ए (BrahMos-A 800 KM Variant) का नाम दिया गया है. बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 290 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम ब्रह्मोस मिसाइल का इस्‍तेमाल किया गया था. इसे Su-30MKI फाइटर जेट से लॉन्‍च किया गया था. अब 800 किलोमीटर रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइल के बेड़े में शामिल होने से लाहौर, कराची, इस्‍लामाबाद, रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों को घर बैठे तबाह किया जा सकता है. साउथईस्‍ट चीन के कई हिस्‍से भी ब्रह्मोस के नए वैरिएंट की जद में आ जाएगा.

    जानकारी के अनुसार, भारत अपनी लंबी दूरी की प्रहार क्षमता को और मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस अब वायुसेना के लिए 800 किलोमीटर रेंज वाले ब्रह्मोस-A सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के नए संस्करण के विकास को फास्ट ट्रैक पर आगे बढ़ा रहा है. सूत्रों के मुताबिक इस उन्नत मिसाइल का इंटीग्रेशन और फ्लाइट ट्रायल 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके बाद 2030 से पहले इसका उत्पादन और तैनाती शुरू हो सकती है. मिसाइल के नए संस्करण की खास बात यह है कि इसकी रेंज बढ़ाकर 800 किलोमीटर कर दी गई है, लेकिन इसके आकार और वजन में कोई बदलाव नहीं किया गया है. इसका वजन करीब 2.5 टन और लंबाई लगभग 6 मीटर ही रहेगी. इस वजह से यह मौजूदा Su-30MKI फाइटर जेट पर बिना किसी बड़े बदलाव के आसानी से तैनात की जा सकेगी. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस लंबी दूरी को हासिल करने के लिए कई तकनीकी सुधार किए गए हैं. इनमें हाई एनर्जी वाले स्वदेशी ईंधन, बेहतर एयर-इनटेक डिजाइन और हल्के कंपोज़िट एयरफ्रेम सेक्शन का उपयोग शामिल है. इन बदलावों की वजह से मिसाइल की क्षमता बढ़ी है.

    दुश्‍मन के एयरस्‍पेस में घुसे बिना तबाही
    ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रह्मोस प्रोग्राम से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 800 किलोमीटर रेंज वाले संस्करण का बेसलाइन डिजाइन और ग्राउंड टेस्टिंग पहले ही पूरी हो चुकी है. नए प्रोपेलेंट के साथ किए गए स्थिर परीक्षणों ने यह पुष्टि कर दी है कि मिसाइल अपेक्षित दूरी तक मार कर सकती है. अब अगला बड़ा चरण Su-30MKI से लाइव सेपरेशन और बूस्ट-फेज ट्रायल का होगा, जिसे 2026 के अंत तक आयोजित करने की योजना है. इसके बाद 2027 में पूरी उड़ान सीमा में सुपरसोनिक ट्रायल किए जाएंगे. यदि यह योजना समय पर पूरी हो जाती है तो भारतीय वायुसेना को गहरी मार करने की अभूतपूर्व क्षमता मिल जाएगी. एक Su-30MKI अगर भारतीय हवाई क्षेत्र के भीतर ही गश्त कर रहा हो, तब भी वह लगभग 800 किलोमीटर दूर स्थित दुश्मन के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकेगा. इसका मतलब यह होगा कि वायुसेना को दुश्मन के हवाई रक्षा नेटवर्क के भीतर घुसने की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी और जोखिम भी घटेगा.

    मारक क्षमता को धार देने की प्‍लानिंग
    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जब इस मिसाइल को भारतीय वायुसेना के आगामी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम के साथ जोड़ा जाएगा तो इसका प्रभावी ऑपरेशनल दायरा और भी बढ़ जाएगा. इससे लक्ष्य की पहचान, ट्रैकिंग और सटीक प्रहार की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा. ब्रह्मोस-A मिसाइल की विश्वसनीयता पहले ही कई बार साबित हो चुकी है. इसी वर्ष हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वायुसेना ने पुराने 290 किलोमीटर रेंज वाले ब्रह्मोस-A का इस्तेमाल करते हुए दुश्मन के कई अहम एयरबेस को सटीकता से निशाना बनाया था. उस अभियान में भारतीय क्षेत्र के भीतर से लॉन्च किए गए मिसाइलों ने दुश्मन की बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली को भेदते हुए कड़े सुरक्षा वाले ठिकानों को भी नष्ट कर दिया था. शुरुआती उत्पादन बैच की मिसाइलों के बावजूद सभी हथियारों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया.

    ब्रह्मोस इन 5 वजहों से बेहद खास
    दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक: BrahMos Missile की सबसे बड़ी खासियत इसकी बेहद तेज रफ्तार है. यह मिसाइल लगभग मैक 2.8 से 3 (ध्वनि की गति से करीब तीन गुना) की स्पीड से उड़ान भर सकती है. इतनी तेज गति के कारण दुश्मन के लिए इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना बहुत कठिन हो जाता है. तेज रफ्तार के कारण यह कम समय में लक्ष्य तक पहुंचकर हमला कर सकती है.

    मल्टी-प्लेटफॉर्म लॉन्च कैपेबिलिटी: ब्रह्मोस को जमीन, समुद्र, पनडुब्बी और हवा चारों प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है. भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इसे अपने अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल करती हैं. वायुसेना इसे खास तौर पर Sukhoi Su-30MKI फाइटर जेट से लॉन्च करती है. इस मल्टी-रोल क्षमता के कारण यह मिसाइल भारत की संयुक्त सैन्य शक्ति को और मजबूत बनाती है.

    बेहद सटीक और फायर-एंड-फॉरगेट टेक्‍नोलॉजी: ब्रह्मोस मिसाइल में आधुनिक इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और एक्टिव रडार सीकर लगे होते हैं. इससे यह अपने लक्ष्य को बहुत सटीकता से पहचानकर उस पर हमला कर सकती है. इसे लॉन्च करने के बाद ऑपरेटर को इसे लगातार नियंत्रित करने की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए इसे फायर-एंड-फॉरगेट मिसाइल भी कहा जाता है. हाई प्रिसिजन के कारण यह महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को नष्ट करने में बेहद प्रभावी है.

    हेवी वारहेड और जबरदस्त मारक क्षमता: ब्रह्मोस मिसाइल लगभग 200 से 300 किलोग्राम तक का पारंपरिक वारहेड ले जा सकती है. इसकी तेज गति और भारी विस्फोटक क्षमता के कारण यह दुश्मन के युद्धपोत, बंकर, रडार स्टेशन और अन्य रणनीतिक ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. समुद्री युद्ध में इसे खास तौर पर दुश्मन के बड़े युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है.

    कम ऊंचाई पर उड़ान और दुश्मन के रडार से बचने की क्षमता: यह मिसाइल समुद्र या जमीन के बेहद करीब यानी लो-लेवल फ्लाइट प्रोफाइल में उड़ान भर सकती है. कम ऊंचाई पर उड़ने से यह दुश्मन के रडार से देर से दिखाई देती है, जिससे उसके पास प्रतिक्रिया करने का समय बहुत कम रह जाता है. इसके अलावा अंतिम चरण में यह तेजी से दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है, जिससे इसकी इंटरसेप्शन संभावना और कम हो जाती है.

    450 किलोमीटर रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइल
    भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ योजनाकार के मुताबिक 290 किलोमीटर संस्करण ने अपनी युद्ध क्षमता पहले ही साबित कर दी है. अब 450 किलोमीटर रेंज वाला संस्करण बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रवेश कर चुका है, जिससे वायुसेना की प्रहार क्षमता और बढ़ गई है. उनका कहना है कि यदि 2028-29 तक 800 किलोमीटर वाला संस्करण स्क्वाड्रन सेवा में आ जाता है, तो भारत के भीतर से लॉन्च की गई मिसाइल पाकिस्तान के आधे से अधिक हिस्से और दक्षिण-पश्चिमी चीन के बड़े क्षेत्र तक रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकेगी. इस समय 450 किलोमीटर रेंज वाले ब्रह्मोस-A का उत्पादन हैदराबाद स्थित नए ब्रह्मोस इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स में शुरू हो चुका है. वहीं 800 किलोमीटर वाले संस्करण को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने नेशनल प्रायरिटी का दर्जा दिया है. इसके तहत परियोजना की गति बढ़ाने और समय पर तैनाती सुनिश्चित करने के लिए विशेष संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

    दो-तीन साल में सीरियल प्रोडक्‍शन
    सूत्रों के मुताबिक यदि परीक्षण सफल रहते हैं तो 2028-29 के आसपास इसका सीरियल प्रोडक्शन शुरू हो सकता है. शुरुआती बैच भारतीय वायुसेना को दिए जाएंगे, जबकि कुछ मित्र देशों ने भी इस विस्तारित रेंज वाले ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है और संभावित निर्यात के लिए बातचीत जारी है. 800 किलोमीटर रेंज वाला ब्रह्मोस-A भारत की वायु शक्ति को एक नया आयाम देने वाला साबित हो सकता है. लंबी दूरी, सुपरसोनिक गति और उच्च सटीकता के संयोजन के साथ यह मिसाइल भविष्य में भारत की गहरी मार और रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता का एक अहम स्तंभ बनने की ओर बढ़ रही है.
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