
नई दिल्ली :सनातन परंपरा (tradition) में चैत्र मास को विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि यह समय न केवल हिंदू नववर्ष के आगमन का संकेत देता है बल्कि ऋतु परिवर्तन (seasonal change) और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से भी जुड़ा माना जाता है।इसी महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को बसोड़ा या शीतला अष्टमी (Sheetla Ashtami) का पर्व (festival) मनाया जाता है जो मां शीतला माता को समर्पित है। धार्मिक मान्यता (belief) के अनुसार शीतला माता को आरोग्य, स्वच्छता और रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है।
इसलिए इस दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका पूजन करते हैं और परिवार की सुख-शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में बसोड़ा का पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च की रात 1 बजकर 54 मिनट से होगी और इसका समापन 12 मार्च की सुबह 4 बजकर 19 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 11 मार्च को ही मनाया जाएगा। इस दिन पूजा के लिए शुभ समय सुबह 6 बजकर 35 मिनट से शाम 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में भक्त मां शीतला की पूजा अर्चना कर सकते हैं।
बसोड़ा पर्व की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और माता को बासी यानी ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शीतला माता को शीतलता अत्यंत प्रिय होती है इसलिए अष्टमी के दिन गर्म भोजन बनाना उचित नहीं माना जाता। यही कारण है कि बसोड़ा से एक दिन पहले यानी शीतला सप्तमी की शाम को ही घरों में भोजन तैयार कर लिया जाता है और अगले दिन उसी ठंडे भोजन को माता को अर्पित किया जाता है।
परंपरा के अनुसार भोग में दही रबड़ी मीठे चावल पुए पूड़ी पराठे और हलवा जैसे व्यंजन शामिल किए जाते हैं। पूजा के बाद यही भोजन प्रसाद के रूप में पूरे परिवार को ग्रहण कराया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से माता प्रसन्न होती हैं और परिवार को रोगों और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा प्रदान करती हैं।
बसोड़ा के दिन पूजा विधि भी विशेष होती है। अष्टमी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ठंडे जल से स्नान किया जाता है और स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद मन ही मन मां शीतला का स्मरण करते हुए आरोग्य सुख और शांति की कामना की जाती है। पूजा की थाली में रोली हल्दी अक्षत ताजे फूल और ठंडा जल रखा जाता है। इसके बाद मां शीतला की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर श्रद्धा भाव से पूजा की जाती है और एक दिन पहले तैयार किया गया ठंडा भोजन उन्हें अर्पित किया जाता है।
पूजा समाप्त होने के बाद माता को अर्पित जल में से थोड़ा जल बचाकर पूरे घर में छिड़का जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और बीमारियों से भी रक्षा होती है। बसोड़ा का यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं है बल्कि यह स्वच्छता स्वास्थ्य और संतुलित जीवन का संदेश भी देता है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में यह पर्व बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
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