
नई दिल्ली । आज 22 अप्रैल का दिन पहलगाम आतंकी हमले (Pahalgam Terrorist Attack) की दर्दनाक यादें फिर ताजा कर देता है। इस हमले को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन करीब 50 परिवारों के लिए यह दर्द आज भी वैसा ही है। किसी ने अपने परिजनों को खोया, तो किसी के शरीर पर लगे जख्म आज भी उस भयावह दिन की कहानी सुनाते हैं। बैसरन घाटी (Baisaran Valley) में हुए इस हमले में आतंकियों (Terrorists) ने परिवार के साथ घूमने आए निर्दोष पर्यटकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी।
जांच में सामने आया है कि हमले से ठीक एक रात पहले दो स्थानीय लोगों ने आतंकियों को देखा था। आरोप है कि यदि ये दोनों समय पर पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों को सूचना देते, तो इतना बड़ा हमला टल सकता था। बताया जाता है कि तीन पाकिस्तानी आतंकी फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी हमले से पहले स्थानीय निवासी परवेज अहमद और बशीर अहमद के घर पहुंचे थे। दोनों ने उन्हें शरण दी, खाना खिलाया और उनकी मौजूदगी की जानकारी होने के बावजूद कोई सूचना नहीं दी।
5 घंटे तक घर में रुके थे आतंकी
रिपोर्ट के अनुसार, आतंकियों ने इन दोनों के घर में करीब पांच घंटे बिताए। इस दौरान वे हथियारों से लैस थे और ‘अली भाई’ नाम के एक बड़े आतंकी कमांडर का जिक्र कर रहे थे, जिससे अंदेशा था कि किसी बड़े हमले की योजना बन रही है। जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकियों की मदद के बदले इन दोनों को 3000 रुपये दिए गए थे। इस लालच में उन्होंने न तो पुलिस को सूचना दी और न ही किसी स्थानीय टूर ऑपरेटर या सुरक्षा तंत्र को अलर्ट किया।
हमले से पहले भी दिखी लापरवाही
21 अप्रैल की रात करीब 10:30 बजे आतंकी उनके घर से निकल गए थे, इसके बावजूद उन्होंने कोई सूचना नहीं दी। अगले दिन बैसरन घाटी में वही आतंकी घात लगाकर बैठ गए और दोपहर में पर्यटकों पर हमला कर दिया। घटना के बाद जब हमले की खबर फैली, तो दोनों आरोपी क्षेत्र छोड़कर पहाड़ों में छिप गए। यह मामला एक बार फिर इस सवाल को उठाता है कि अगर समय रहते सही जानकारी दी जाती, तो शायद इतने बड़े नरसंहार को रोका जा सकता था।
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