
डेस्क: यूरोपीय संघ (EU) अपने यहां औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के नियम बदलने की तैयारी में है, जिससे चीन के साथ आर्थिक टकराव और तेज हो सकता है. Made in Europe नाम के नए ढांचे के तहत सरकार का पैसा घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने में लगेगा और विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम की जाएगी. यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि यूरोप में फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, नौकरियां जा रही हैं और बाहरी देशों पर निर्भरता बढ़ रही है. चीन ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है, जिससे वैश्विक व्यापार में नया तनाव पैदा हो सकता है.
इस पूरे विवाद के केंद्र में Industrial Accelerator Act है, जिसे मार्च 2026 में यूरोपीय आयोग ने पेश किया. इसके तहत Made in Europe नियम लागू होंगे, यानी सरकारी फंड पाने के लिए कंपनियों को यूरोप में ही तय सीमा तक उत्पादन करना होगा. उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिक वाहनों में 70% सामग्री यूरोप की होनी चाहिए (हालांकि बैटरी के कुछ हिस्सों को छूट है). एल्यूमिनियम और सीमेंट कंपनियों के लिए 25% लोकल कंटेंट जरूरी है.
इसके अलावा, जिन देशों की कंपनियां किसी सेक्टर में 40% या उससे ज्यादा वैश्विक हिस्सेदारी रखती हैं, उन्हें अपनी कमाई का आधा फायदा EU के कामगारों को देना होगा. विदेशी हिस्सेदारी 49% से कम रखनी होगी। कंपनियों को यूरोपीय पार्टनर्स के साथ जॉइंट वेंचर बनाना, टेक्नोलॉजी शेयर करना, रिसर्च पर पैसा खर्च करना और कम से कम 30% उत्पादन यूरोप में करना होगा. EU के इंडस्ट्री कमिश्नर Stéphane Séjourné के मुताबिक यह कदम बचाव के लिए जरूरी है, ताकि यूरोप अपनी औद्योगिक ताकत दोबारा खड़ी कर सके.
यह कानून खास तौर पर उन सेक्टर्स पर फोकस करता है जो यूरोप के लिए भविष्य में अहम हैं. जैसे इलेक्ट्रिक गाड़ियां, ग्रीन टेक्नोलॉजी, स्टील और एल्यूमिनियम. इन सभी में चीन की मजबूत मौजूदगी है. पिछले कुछ सालों में चीनी कंपनियों ने इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और इंडस्ट्रियल मटेरियल में तेजी से विस्तार किया है, जिससे यूरोपीय कंपनियों पर दबाव बढ़ा है. अब EU खुला बाजार रखने की बजाय शर्तों के साथ बाजार में एंट्री दे रहा है. यानी सब्सिडी और सरकारी ठेके अब नीतिगत हथियार बनेंगे.
यूरोप में 2024 के बाद से करीब 2 लाख नौकरियां जा चुकी हैं, खासकर ऑटो और ऊर्जा आधारित उद्योगों में. आने वाले समय में ऑटो सेक्टर में 6 लाख और नौकरियां जाने का खतरा है. इसके पीछे वजहें हैं ऊंची ऊर्जा कीमतें, धीमी इनोवेशन और चीन से सस्ते सामान की कड़ी प्रतिस्पर्धा. साथ ही, EU को डर है कि जरूरी टेक्नोलॉजी के लिए वह बाहर के देशों पर ज्यादा निर्भर हो गया है. इसलिए यह कानून सप्लाई चेन सुरक्षित करने और जोखिम कम करने के लिए भी लाया जा रहा है.
China ने इस पर कड़ा विरोध जताया है. उसका कहना है कि यह World Trade Organization के नियमों के खिलाफ है और चीनी कंपनियों के साथ भेदभाव करता है. चीन ने जवाबी कदम उठाने की बात कही है, जिसमें टैरिफ बढ़ाना, यूरोपीय कंपनियों पर रोक लगाना या अंतरराष्ट्रीय मंच पर शिकायत करना शामिल हो सकता है.
EU का यह कदम दिखाता है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब घरेलू उत्पादन पहले की नीति अपना रही हैं. अमेरिका पहले ही ऐसा कर चुका है और चीन लंबे समय से यही कर रहा है. अगर ऐसे ही लोकल नियम बढ़ते रहे, तो वैश्विक फ्री ट्रेड कमजोर पड़ सकता है और देशों के बीच विवाद बढ़ सकते हैं. यूरोप के लिए यह नीति फायदे और नुकसान दोनों ला सकती है एक तरफ नौकरियां बचेंगी, लेकिन दूसरी तरफ लागत बढ़ सकती है और जवाबी कार्रवाई का खतरा रहेगा.
फिलहाल यह कानून EU के सदस्य देशों और संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. लेकिन साफ है कि यूरोप अब अपनी अर्थव्यवस्था को ज्यादा आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाने की दिशा में बढ़ रहा है. आगे चलकर Made in Europe बनाम Made in China की यह टक्कर दुनिया के व्यापार के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है.
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