
नई दिल्ली । इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा कि सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने की (Offering Namaz on Public Land) इजाजत नहीं दी जा सकती (Cannot be Allowed) ।
कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आजादी के नाम पर इस पर कब्जे की इजाजत नहीं दी जा सकती है। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने शनिवार को यह आदेश असीन नाम के एक व्यक्ति की रिट याचिका को खारिज करते हुए दिया। असीन ने दावा किया था कि अधिकारी संभल जिले के डिकोना गांव में जमीन के एक टुकड़े पर नमाज अदा करने से रोक रहे हैं।
याचिकाकर्ता ने 16 जून 2023 की एक रजिस्टर्ड ‘गिफ्ट डीड’ (दान पत्र) के आधार पर जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया। असीन ने तर्क दिया कि उसे और अन्य नमाजियों को परिसर में नमाज अदा करने से गैर-कानूनी रूप से रोका जा रहा है। उसने आगे आरोप लगाया कि यह रुकावट मनमानी थी और कुछ सामाजिक तत्वों के साथ मिलीभगत करके की गई थी, जो संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका का विरोध किया और कहा कि विचाराधीन जमीन ‘आबादी जमीन’ के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए है। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपना मालिकाना हक साबित करने में विफल रहा है। यह भी कहा गया कि उस जमीन पर पारंपरिक रूप से सिर्फ विशेष अवसरों (जैसे ईद) पर ही नमाज अदा की जाती रही है और अब याचिकाकर्ता बाहर के लोगों को शामिल करके नियमित सामूहिक नमाज शुरू करने की कोशिश कर रहा है, जिससे गांव में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड से पता चलता है कि जमीन सार्वजनिक है और दान-पत्र के आधार पर याचिकाकर्ता का मालिकाना हक का दावा सरकारी रिकॉर्ड को बदल नहीं सकता है।
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