नई दिल्ली। कर्नाटक (Karnataka) ने शराब पर टैक्स वसूली के तरीके में बड़ा बदलाव करते हुए देश में पहली बार अल्कोहल-इन-बेवरेज (AIB) आधारित उत्पाद शुल्क प्रणाली लागू कर दी है। 11 मई 2026 से लागू इस नई व्यवस्था के तहत अब शराब पर टैक्स उसकी बोतल या मात्रा के बजाय उसमें मौजूद अल्कोहल प्रतिशत के आधार पर तय किया जाएगा।
राज्य सरकार ने इसे आबकारी नीति में ऐतिहासिक सुधार बताया है। यह फैसला मुख्यमंत्री
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के 2026-27 बजट का हिस्सा है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से टैक्स प्रणाली अधिक वैज्ञानिक और पारदर्शी बनेगी, साथ ही पड़ोसी राज्यों के मुकाबले कीमतों में संतुलन आएगा।
अब तक कर्नाटक में शराब पर टैक्स बोतल की मात्रा यानी लीटर के हिसाब से लगाया जाता था, लेकिन नई प्रणाली में टैक्स सीधे शराब में मौजूद अल्कोहल की मात्रा से जुड़ा होगा। सरकार ने पुरानी 16 टैक्स स्लैब को घटाकर 8 कर दिया है।
इसके अलावा सरकार द्वारा तय अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) व्यवस्था भी खत्म कर दी गई है। अब कंपनियां बाजार की मांग और अल्कोहल प्रतिशत के आधार पर खुद कीमत तय कर सकेंगी।
किन शराबों के दाम घट सकते हैं?
उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, नई नीति के बाद हल्की और कम अल्कोहल वाली बीयर सस्ती हो सकती है। अनुमान है कि माइल्ड और लेगर बीयर की कीमतों में 20 से 25 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
इसी तरह प्रीमियम स्कॉच व्हिस्की और आयातित शराब के दामों में भी 16 से 20 प्रतिशत तक गिरावट संभव है। इससे प्रीमियम ब्रांड्स के ग्राहकों को राहत मिल सकती है।
सस्ती शराब हो सकती है महंगी
जहां प्रीमियम शराब के दाम घटने की संभावना है, वहीं कम कीमत वाली शराब महंगी हो सकती है। खासतौर पर छोटे पैक में बिकने वाली व्हिस्की, रम, ब्रांडी, जिन और वोडका के दाम 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का उद्देश्य ज्यादा अल्कोहल वाले और कम कीमत में बिकने वाले उत्पादों पर अधिक टैक्स लगाकर सेवन को नियंत्रित करना भी है।
सरकार को क्या होगा फायदा?
सरकार ने चालू वित्त वर्ष में आबकारी विभाग से लगभग 45 हजार करोड़ रुपये राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा है। नई नीति को तैयार करने वाली समिति ने सुझाव दिया था कि शराब से होने वाले सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभावों को ध्यान में रखते हुए टैक्स सीधे अल्कोहल स्तर से जुड़ा होना चाहिए।
उद्योग संगठनों ने भी इस बदलाव का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह मॉडल राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ जिम्मेदार शराब सेवन को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। अब माना जा रहा है कि आने वाले समय में दूसरे राज्य भी कर्नाटक के इस मॉडल को अपनाने पर विचार कर सकते हैं।
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