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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बेटों के बंटवारे से खत्म नहीं होगा बेटियों का हक

May 18, 2026

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि भाइयों के आपसी बंटवारे (The brothers’ mutual friendliness) से बेटियों का कानूनी हक खत्म नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो बेटी भी ‘क्लास-1 वारिस’ के रूप में संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार होगी।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस (Sanjay Karol) और जस्टिस (A.G. Masih) की पीठ ने यह फैसला कर्नाटक के एक पारिवारिक संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने कहा कि बेटियों को उनके अधिकार से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि बेटों ने पहले ही संपत्ति का बंटवारा कर लिया था।

क्या था पूरा मामला?

मामला (Karnataka) के रहने वाले बीएम सीनप्पा नामक व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा था। उनकी 1985 में बिना वसीयत के मृत्यु हो गई थी। परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और चार बेटे थे।

पिता की मौत के बाद बेटों ने पहले आपसी सहमति से और बाद में वर्ष 2000 में रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए संपत्ति का बंटवारा कर लिया। आरोप था कि इस प्रक्रिया में बेटियों को शामिल नहीं किया गया और उन्हें कोई हिस्सा नहीं दिया गया।

बेटियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया

वर्ष 2007 में बेटियों ने अदालत में याचिका दायर कर कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत उन्हें भी संपत्ति में बराबरी का अधिकार है। वहीं भाइयों ने तर्क दिया कि 2000 में हुआ बंटवारा 2005 के संशोधन से पहले का है, इसलिए वह सुरक्षित है।

इसी आधार पर पहले Karnataka High Court ने बेटियों की याचिका खारिज कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि कानून की धारा 6(5) केवल पुराने बंटवारों को नए संशोधन के प्रभाव से बचाती है, लेकिन इससे बेटियों का स्वतंत्र उत्तराधिकार अधिकार खत्म नहीं होता।

अदालत ने कहा कि बेटी का अधिकार सिर्फ कॉपार्सनरी अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पिता की संपत्ति में प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी भी है। इसलिए उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।



  • मामला फिर ट्रायल कोर्ट भेजा गया

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तय करना कि पुराना बंटवारा वैध था या नहीं, एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसकी जांच ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होनी चाहिए।

    इसी के साथ अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया कि संपत्ति की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाए।

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