कोलकाता। पश्चिम बंगाल (West Bengal) विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद अब विपक्षी दलों की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर ममता बनर्जी ( Mamata Banerjee) की त्रिमूल (All India Trinamool Congress) ने चुनाव से पहले कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के साथ बेहतर तालमेल बनाया होता, तो नतीजे काफी अलग हो सकते थे।
दर्जनों सीटों पर पड़ा असर
चुनावी आंकड़ों के अनुसार, एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस के वोटों ने टीएमसी की संभावित जीत को प्रभावित किया। कई जगहों पर कांग्रेस को मिले वोट भाजपा और टीएमसी के बीच जीत के अंतर से ज्यादा थे।
बताया जा रहा है कि कुछ सीटों पर नोटा ने भी टीएमसी का खेल बिगाड़ा। इन सीटों पर कांग्रेस को नोटा से अधिक वोट मिले थे, जिससे विपक्षी मतों का विभाजन और स्पष्ट दिखाई दिया।
राज्य की 294 विधानसभा सीटों में भाजपा ने 207 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि टीएमसी को केवल 80 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 2 और वाम दलों को 1 सीट पर सफलता मिली।
मुस्लिम वोटों का बंटवारा भी पड़ा भारी
विश्लेषकों का कहना है कि Murshidabad, Malda और Uttar Dinajpur जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी विपक्षी वोटों का विभाजन भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हुआ।
इन क्षेत्रों की 43 सीटों में भाजपा ने 20 सीटें जीत लीं। माना जा रहा है कि कांग्रेस, वाम दलों, इंडियन सेकुलर फ्रंट और अन्य क्षेत्रीय दलों में वोट बंटने से टीएमसी को नुकसान हुआ। जबकि 2021 में यही वोट बैंक काफी हद तक टीएमसी के साथ एकजुट था।
लेफ्ट वोट बैंक अभी भी प्रभावी
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में वाम दलों का जनाधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उनके पास अब भी लगभग सात प्रतिशत वोट शेयर मौजूद है। यही वजह है कि कई सीटों पर लेफ्ट और कांग्रेस को मिले वोट निर्णायक साबित हुए।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि INDIA गठबंधन के दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते, तो मुकाबला कहीं ज्यादा कड़ा हो सकता था।
चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी खेमे में फिर से एकजुटता की जरूरत पर चर्चा शुरू हो गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि विधानसभा चुनावों में भी मजबूत तालमेल जरूरी होगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी याद दिला रहे हैं कि विपक्षी वोटों के बंटवारे का असर पहले भी कई राज्यों में देखने को मिला है। Delhi और Gujarat के चुनावों में भी इसी तरह विपक्षी दलों के अलग-अलग लड़ने से भाजपा को फायदा मिला था।
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